रुमाल

बड़ी उसनती सी गर्मी है। बिजली जाते ही मानो संसार थम जाता है। ऐसी निःस्तब्धता निर्जीव में भी जान डाल देती है। सामान्यतः सूती कपड़े का एक चौकोर टुकड़ा। सादा, रंगीन, बेल-बूटेदार या सजीला किनारी वाला, विविध रुपों में सहजतापूर्वक हर जगह उपलब्ध। दाग-धब्बे समेटे हुए तो कभी सुगंधित इत्र की महक से गमकता हुआ। … Read more

नारीत्व और नारीवाद 

बारहवीं क्लास में पहुंचने के पहले ही मेरी बहने, बढ़िया खाना बना लेती थी। रोटियां एकदम गोल, आप चाहे तो गोलंबर से नाप सकते थे। सिलाई, कढ़ाई, बुनाई के साथ क्रोसिया का काम भी उन्होंने खेल-खेल में सिद्धस्त कर लिया था। अपना सलवार सूट सिलने के साथ-साथ मम्मी की साड़ी में फाल लगाना, पापा और … Read more

पतंग

क्या स्वाधीनता की कोई कीमत होती है। पतंग की डोर किसी के हाथ में होनी चाहिए तभी वो ऊपर बनी रहती हैं । समाज इसे ही सच मानता है । और हमे पतंग। जो भी हो एक बदलाव तो साफ दिखाई देता है । अकसर मेरे इर्द-गिर्द का समाज मुझे अनवरत अहसास दिलाता रहता है … Read more

शहर

जब घड़ी नही थी तब लोग आती-जाती मौसमों से समय का हिसाब रखते थे। समयांतराल बड़ा हुआ करता था। लोग सालो, महीनों और हफ़्तों की अवधि में बात किया करते थे। अक्सर सुना है बूढ़े-बुज़ुर्गो को कहते हुए की उम्र के फलाना बसंत में फलाना चीजे हुई। रोज़मर्रा की जरूरतें पूरी करते-करते हम मौसम का … Read more

आसान तो नही होता।

जो आयी है लवों पर,तो कुछ तो वजह होगी। यूं बेमतलब मुस्कुराना,आसान तो नही होता।। ख़ुशी हो कोई गम हो,छलक कर तो आये। यूं कगार पे रह जाना,आसान तो नही होता। समा जलती बुझती,जैसे पलके हो झुकती, यूं सिमट के बिखर जाना,आसान तो नहीं होता।

किरायेदार

बेघर…सिसकती बेमौसम बरसात में,अपना सब्र-ओ-सामान लिए फिरते है।। हम उधरी जिल्द लगी एक,ज़िन्दगी की किताब लिए फिरते है।।किरायेदार है हम हरदम घर-ब-घर,उम्मीदें बेहिसाब लिए फिरते है।। तुम दिखते हो थक कर बैठे एक पड़ाव पर,हम कलेजे में उन्मुक्त उड़ान लिए फिरते है।।ज़ज़्बा कहां से लाओगे हमारे जैसा,नक़्शे मंजिलों के हज़ार लिए फिरते है।।

सच बता की क्या ख्वाबों में कभी…

कुछ उधरे ख़्याल बुन रहा हूँ।बड़ी भीड़ है यहां,अब ख़ामोशी चुन रहा हूँ।मेरे जज़्बात अक्सर टोक देते है।हूँ अकेले बैठा क्यूँ,और किसको सुन रहा हूँ। माहौल।आजकल जब शाम तेरा पता पूछती है तो कह देता हूँ बाजार गयी है अभी आ जायेगी। जब तक वो आती है तब तक मेरे साथ ही बैठ जाओ। पहले … Read more

आधी मुहब्बत का कुछ तो असर होता है

नादान इस तरह न देख मुझे।तुझे अंदाज़ा नही की क्या होता है।।रगों में उफनता है सैलाब लहू का।सारी रात न इंसान ये फिर सोता है।। कनखियों से वाण सीधे जिगर पर।कहर मासूमियत में गजब होता है।।रहे आशिकी एक तरफा ही सही।आधी मुहब्बत का कुछ तो असर होता है।।

क्या वो मेरा पहला प्यार था?

बचपन में जाड़े के महीनों में स्कूल जाते वक्त हड्डियां जमाने वाली ठंड में, ऊन के दस्ताने उतारकर, नाली के किनारे निष्ठुर प्रकृति की मार खाये कुकुआँते पिल्लों को हाथ में उठा कर सीने से लगा लेना। ये वो ऊन के दस्ताने थे जो दीदी के पुराने स्वेटर का पुनर्जन्म था। मुझे आज तक यह … Read more

वही शाम…

मेरे लब्ज़ों से तुम क्या ले जाओगे।थोड़ी उदासी की तपिश,थोड़ी काँटो की छुअन,थोड़ी सी दिलफ़रेब सुबह,थोड़ी सी मक्कार रात,और एक अनसुलझी तनहा शाम।वही शाम जिसके इंतज़ार में तुम,बेसब्र हुआ करते थे, कभी। वही शाम जो दिन को किसी,अजगर की तरह सनै-सनै निगल लेती थी।वही शाम जो उस जगह खींच ले जाती,जहाँ तुम उस से पहली … Read more