लॉक डाउन।

कभी सोचा है की क्या सोचते है आप ? गमछे, लूँगी, गंजी के कोने से ऐनक साफ करते समय शून्य में ताकते हुए… एक टाँग पर टाँग बदल-बदलकर खड़े होते हुए चुल्हे पर रखे दूध के उबाल पर नज़र टिकाए… नेल कटर से उछले हुए नाखूनों को पैर से मेज़ के नीचे से घसीट का … Read more

तन्हाई ! 

अब पता होता है कि ये रात लंबी तो हो सकती है लेकिन हमेशा के लिए नहीं है। अब वैसी बेचैनी नहीं होती है। उतनी घुटन नहीं होती। आदत हो गयी है नहीं कह सकता लेकिन प्रतिकार का कोई फायदा नहीं तो इस आराम को मेरी मूक सहमति समझा जाये। बेवफाई का जायका ज़रा फीका … Read more

रुमाल

बड़ी उसनती सी गर्मी है। बिजली जाते ही मानो संसार थम जाता है। ऐसी निःस्तब्धता निर्जीव में भी जान डाल देती है। सामान्यतः सूती कपड़े का एक चौकोर टुकड़ा। सादा, रंगीन, बेल-बूटेदार या सजीला किनारी वाला, विविध रुपों में सहजतापूर्वक हर जगह उपलब्ध। दाग-धब्बे समेटे हुए तो कभी सुगंधित इत्र की महक से गमकता हुआ। … Read more

शहर

जब घड़ी नही थी तब लोग आती-जाती मौसमों से समय का हिसाब रखते थे। समयांतराल बड़ा हुआ करता था। लोग सालो, महीनों और हफ़्तों की अवधि में बात किया करते थे। अक्सर सुना है बूढ़े-बुज़ुर्गो को कहते हुए की उम्र के फलाना बसंत में फलाना चीजे हुई। रोज़मर्रा की जरूरतें पूरी करते-करते हम मौसम का … Read more

सच बता की क्या ख्वाबों में कभी…

कुछ उधरे ख़्याल बुन रहा हूँ।बड़ी भीड़ है यहां,अब ख़ामोशी चुन रहा हूँ।मेरे जज़्बात अक्सर टोक देते है।हूँ अकेले बैठा क्यूँ,और किसको सुन रहा हूँ। माहौल।आजकल जब शाम तेरा पता पूछती है तो कह देता हूँ बाजार गयी है अभी आ जायेगी। जब तक वो आती है तब तक मेरे साथ ही बैठ जाओ। पहले … Read more

क्या वो मेरा पहला प्यार था?

बचपन में जाड़े के महीनों में स्कूल जाते वक्त हड्डियां जमाने वाली ठंड में, ऊन के दस्ताने उतारकर, नाली के किनारे निष्ठुर प्रकृति की मार खाये कुकुआँते पिल्लों को हाथ में उठा कर सीने से लगा लेना। ये वो ऊन के दस्ताने थे जो दीदी के पुराने स्वेटर का पुनर्जन्म था। मुझे आज तक यह … Read more

वही शाम…

मेरे लब्ज़ों से तुम क्या ले जाओगे।थोड़ी उदासी की तपिश,थोड़ी काँटो की छुअन,थोड़ी सी दिलफ़रेब सुबह,थोड़ी सी मक्कार रात,और एक अनसुलझी तनहा शाम।वही शाम जिसके इंतज़ार में तुम,बेसब्र हुआ करते थे, कभी। वही शाम जो दिन को किसी,अजगर की तरह सनै-सनै निगल लेती थी।वही शाम जो उस जगह खींच ले जाती,जहाँ तुम उस से पहली … Read more

मर्ज-ए-इश्क़

वक़्त के पहियों में पावं डालकर घिसटा था मैं बहुत देर तक इसके साथ घूमने से पहले। तब मेरी कराह का मज़ाक उड़ाया था तुमने। मैं रुका था, इतना रुका था, कि समय भी चिढ़ गया था मुझसे। कहता था, ऐसे खंरोंचों से तुम्हें क्या मिलेगा। रोज एक ही ज़ख्म छीलते हो, देखता हूँ और … Read more

अर्धसत्य

आज सफाई की कमरे की और फिर वही पुराने उहापोह में दिल और दिमाग बेचैन है। फिर से वही चीज़े सामने रखी है जो किसी इस्तेमाल की नहीं या कहे तो शायद बिता वक़्त जो छाप छोड़ कर गया है उन पर, उसकी इज़ाजत नहीं देता। ये पहली बार नहीं है पता नहीं कितनी बार … Read more