लॉक डाउन।

कभी सोचा है की क्या सोचते है आप ?

गमछे, लूँगी, गंजी के कोने से ऐनक साफ करते समय शून्य में ताकते हुए…

एक टाँग पर टाँग बदल-बदलकर खड़े होते हुए चुल्हे पर रखे दूध के उबाल पर नज़र टिकाए…

नेल कटर से उछले हुए नाखूनों को पैर से मेज़ के नीचे से घसीट का इकठ्ठा करते हुए…

साफ धुली ताज़ा बिस्तर पर बिछी चादर पर बेमतलब एड़ियां रगड़-रगड़ के हल्की सलवटों को संभालते हुए…

दसियों बार झाड़ू से जमा कूड़े को प्लास्टिक के पैन में चढ़ाते हुए अंत में फिर भी बचे धूल के कणों को देखते हुए…

धुले कपड़ो की जेब में किराने की रसीद और कभी कभार कागज़ के गुमनाम पुर्जो को सीधा करते हुए…

कभी सोचा है की क्या सोचते है आप !

Leave a Comment