प्रकृति से विद्रोह

सिगनलों की कतार में, गाड़ियों की चीत्कार में।काँपती है छाती तेरी, मनुष्य निर्मित संसार में।। धुंध सी सोती सुबह में, धुंए में लिपटी शाम में।सच बता क्या इतना मजा है, हार के इस जाम में।। प्राणवायु के अभाव में, गटर में बहती नाव में।सड़क पे पड़े कूड़े में, आदम के टूटे खिलौने में।। अभिमान के … Read more