नादान इस तरह न देख मुझे।
तुझे अंदाज़ा नही की क्या होता है।।
रगों में उफनता है सैलाब लहू का।
सारी रात न इंसान ये फिर सोता है।।
कनखियों से वाण सीधे जिगर पर।
कहर मासूमियत में गजब होता है।।
रहे आशिकी एक तरफा ही सही।
आधी मुहब्बत का कुछ तो असर होता है।।
नादान इस तरह न देख मुझे।
तुझे अंदाज़ा नही की क्या होता है।।
रगों में उफनता है सैलाब लहू का।
सारी रात न इंसान ये फिर सोता है।।
कनखियों से वाण सीधे जिगर पर।
कहर मासूमियत में गजब होता है।।
रहे आशिकी एक तरफा ही सही।
आधी मुहब्बत का कुछ तो असर होता है।।