वही शाम…

मेरे लब्ज़ों से तुम क्या ले जाओगे।थोड़ी उदासी की तपिश,थोड़ी काँटो की छुअन,थोड़ी सी दिलफ़रेब सुबह,थोड़ी सी मक्कार रात,और एक अनसुलझी तनहा शाम।वही शाम जिसके इंतज़ार में तुम,बेसब्र हुआ करते थे, कभी। वही शाम जो दिन को किसी,अजगर की तरह सनै-सनै निगल लेती थी।वही शाम जो उस जगह खींच ले जाती,जहाँ तुम उस से पहली … Read more