किरायेदार
बेघर…सिसकती बेमौसम बरसात में,अपना सब्र-ओ-सामान लिए फिरते है।। हम उधरी जिल्द लगी एक,ज़िन्दगी की किताब लिए फिरते है।।किरायेदार है हम हरदम घर-ब-घर,उम्मीदें बेहिसाब लिए फिरते है।। तुम दिखते हो थक कर बैठे एक पड़ाव पर,हम कलेजे में उन्मुक्त उड़ान लिए फिरते है।।ज़ज़्बा कहां से लाओगे हमारे जैसा,नक़्शे मंजिलों के हज़ार लिए फिरते है।।