पतंग

क्या स्वाधीनता की कोई कीमत होती है। पतंग की डोर किसी के हाथ में होनी चाहिए तभी वो ऊपर बनी रहती हैं । समाज इसे ही सच मानता है । और हमे पतंग। जो भी हो एक बदलाव तो साफ दिखाई देता है । अकसर मेरे इर्द-गिर्द का समाज मुझे अनवरत अहसास दिलाता रहता है … Read more

शहर

जब घड़ी नही थी तब लोग आती-जाती मौसमों से समय का हिसाब रखते थे। समयांतराल बड़ा हुआ करता था। लोग सालो, महीनों और हफ़्तों की अवधि में बात किया करते थे। अक्सर सुना है बूढ़े-बुज़ुर्गो को कहते हुए की उम्र के फलाना बसंत में फलाना चीजे हुई। रोज़मर्रा की जरूरतें पूरी करते-करते हम मौसम का … Read more