क्या स्वाधीनता की कोई कीमत होती है। पतंग की डोर किसी के हाथ में होनी चाहिए तभी वो ऊपर बनी रहती हैं । समाज इसे ही सच मानता है । और हमे पतंग। जो भी हो एक बदलाव तो साफ दिखाई देता है । अकसर मेरे इर्द-गिर्द का समाज मुझे अनवरत अहसास दिलाता रहता है कि कुछ कमी है। बड़े फूहड़ और भद्दे प्रयास भी किये जाते रहे है इस पतंग की डोर को पकड़ने में। कुछ एक शालीन और सभ्य अवसरवादी अनुमोदन भी किये गए। ये नही कहूंगी की अरुचि है लेकिन बस नही चाहिए।
साइड बर्थ, स्लिपर कोच, रेलगाड़ी की चाल की दिशा की तरफ पीठ करके बैठी-बैठी मैं अपने रीढ़ की निचली हड्डियों की बनावट महसूस कर रही थी। तत्काल में टिकट लिया हो तो सुविधा से समझौता कर लीजिए ये भारतीय रेलवे है। भारत विविध ही नही विचित्र भी है इसका अनुभव करना हो तो रेल का सफर जरूर कीजिये। यहां आपको हर एक प्रजाति के नर मिलेंगे। विभिन्न आयु वर्गो के, भिन्न-भिन्न प्रांतों के, पर आश्चर्यजनक रूप से लगभग एक सी सोंच रखने वाले पुरुष। ये वो होते है जिनके हाथ में तात्कालिक अवसर पर किसी की डोर नही होती । और ये निरंतर किसी अकेली पतंग के ताक में लगे रहते है। फिर चाहे वो पतंग थोड़े समय के लिए ही हाथ में क्यों न आये। बस आ जाये… इससे इनको खेल में बने रहने का गुमान होता है। एक अजीब भंगुर प्रकृति का आत्मस्वाभिमान जागृत होता है इनके अंदर। बस थोड़ी बात ही हो जाये।
मेरे सामने वाली सीट पर एक प्रौढ़ जो चेहरे से अपनी आयु के तीसरे दसक को पार किया और शारीरिक बनावट से किसी ऐसे वर्ग से जान पड़ता है जहां मेहनत के काम के साथ कामचोरी का भी सुअवसर प्राप्य हो। कद-काठी में सामान्य लेकिन पेट उल्टी कढ़ाई सरीखा उभरा होना चरित्र का मेहनतकश होने पर सवाल खड़ा कर रहा था। ये पहली बार नही था जब उसने सकपका कर नज़रे खिड़की की तरफ मोड़ ली थी। अगर आपने बिना आस्तीन के कपड़े पहने है तो आप आमंत्रण पत्र लेकर नही घूम रही है ऐसा एक खास पुरुष वर्ग को कब समझ में आएगा?
मेरे बायीं ओर आपातकालीन खिड़की थी जिसका ग्रिल ढीला होने की वजह से वो किट-किट-किट-किट-किट्ट … की ध्वनि के साथ पहियों की दगड-दगड-दगड से ताल मिला रहा था। पश्चिम घाट के सफर में कई मनोहर दृश्य आते-जाते है। अनेको सुरंग, पेड़ो से ढके पठार और बीच-बीच में पतली, चौड़ी नदियां। जब ट्रेन नदियों पे बने पुल के ऊपर से गुजर रही होती है तो इसकी आवाज़ बदल जाती है इस बदलाव में ज़मीन के नीचे का खालीपन महसूस होता है। जब सुरंग से गुजरती है तो सिर के ऊपर का भार महसूस होता है यहां आवाज़ भारी हो जाती है और खिड़की की किट-किट करीब सुनाई देने लगती है।
ध्वनि बड़ा महत्व रखती है। यह आपको हतोत्साहित कर सकती है डरा सकती है दिलाशा भी दिया सकती है। इन्ही आवाजों की जुगल-बंदी में यकायक सीटियों, भद्दे, फूहड़, अश्लील फ़िकरो की मिली जुली ध्वनि प्रबल हो उठती हर बार ज्यूंहि ट्रेन सुरंग में प्रवेश करती। दिन का सफ़र, डिब्बे में कोई कृत्रिम प्रकाश न होने की वजह से सुरंग में घुप्प अँधेरा छा जाता है। अंधेरा आदमी के अंदर का जानवर बाहर ले देता है। बात सिर्फ इस सुरंग की नहीं है। मेरा निज़ी अनुभव है।
“मुझे दर्द हो रहा है हाथ छोड़ो।”
अभिनाश – कल तक तो नहीं होता था। आज अचानक क्यों मेरी पकड़ में कांटे लग गए। 3 साल के रिश्ते में ये कोई पहली बार तो है नहीं, आज एक आखिरी बार और सही।
ये पहला मौका नहीं था जब हम हमबिस्तर हुए थे। पर अभी जो आंखों के सामने नज़ारा था वो क्रूर था, विभत्स था। पहले इसकी आँखों में प्यार दिखता था, हरकतों में दीवानगी थी, ख़यालो में जुनून था। अब नैराश्य, अहंकार और हार की परछाई दिखती है। मैं बदल गयी थी, हाँ मानती हूँ। पर ये विचित्र हो गया था। अजीब। मेरी समझ से बाहर। मेरी कलाई बिस्तर पे धँसती जा रही थी और वो मेरे ऊपर झुकता चला जा रहा था।
मैं – मैं चिल्ला दूंगी। तुम्हें बात समझ में नहीं आती है क्या? अगर तुम फोन पर रोना-धोना शुरू नहीं करते तो मैं कभी तुम्हारे साथ यहां नहीं आती।”
अभिनाश – अब रोना ही लिखा है मेरी ज़िंदगी में, तुम्हें क्या फर्क़ पड़ता है इससे। बहुत आसान होता है कहना कि “अब मैं तुम्हें नहीं चाहती”। कहो क्या बदल गया है ? कोई और मिल गया है ? या अब मैं तुम्हारे काबिल नहीं रहा ?
“जो छुअन मीठी हो सकती है सख्त होने के बाद भी, वही विपरीत परिस्थितियों में, जहाँ प्यार की जगह अहंकार ले चुका होता है एक तीखे दर्द में तब्दील हो जाती है। मेरी गलफड़ों का मांस जबड़ो में धँस गया था और उसकी उंगलियों का निशान गालों पर छपता जा रहा था। मेरी आवाज़ अस्पस्ट हो गयी और फिर एक ऐसा मक़ाम आया जब मेरी आँखों से छलके आँसू बात करने लगे और मैं चुप हो गयी।
अपर्ण और समर्पण का फर्क़ अगले चंद मिनटों में मैं उतरती-चढ़ती सांसो के साथ समझती रही। बाहर हॉल में दोस्तों की फ्राइडे पार्टी ख़त्म हो चुकी थी। रॉक म्यूजिक जो अब तक कुछ हद तक अंदर की आवाज़ बाहर नहीं जाने दे रहा था बंद हो चुका था। करीब दो बज चुके थे।
अभिनाश खिड़की से सटकर लगे प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा था। मैं नीचे गद्दे के ठीक बीचो-बीच दोनों टांगे फैलाये छत की तरफ एकटक देखे जा रही थी। वो लगातार कुछ बोले जा रहा था। उसका सिर कभी मेरी तरफ कभी खिड़की की तरफ। खिड़की से आ रही पीली रोशनी कमरे के बाहर बालकनी में टंगे कपड़ो के साथ-साथ लुका-छिपी खेल रही थी।
वो लगातार कुछ न कुछ बोले जा रहा था। मुझे लग रहा था जैसे किसी अनजान भाषा की फ़िल्म स्लो-मोशन में चला दी गयी हो। मैं कुर्सी पर बैठे उस किरदार को पहचानने की कोशिश कर रही थी। नज़रे तिरछी कर बीच-बीच में उसे देखती थी फिर वापस छत पे आँखे टिक जाती। मैं इस आदमी को नहीं पहचानती… मैं यहां इस बिस्तर पे क्या कर रही हूँ…क्या मैंने शराब पी थी… क्या ये सच है… कहीं ये कोई बेमतलब सा ख़्वाब तो नहीं…क्या है ये ?”
अभिनाश – अब कुछ बोलती क्यों नहीं। मेरी क्या गलती है यही बता दो। क्या मैंने कभी कुछ कहा तुम्हें आजतक। हर चीज की आज़ादी दी। तुम्हें अपनी ज़िंदगी में सबसे आगे रखा। क्या बदल गया अचानक ?
“मैं खामोश थी। ऐसा नहीं था कि बोलने को कुछ नहीं था। मुझे पता था कि गलती मेरी भी थी। मैंने एक चिंगारी को आग बनने दिया। लेकिन क्या इस आग में अपना वज़ूद जल जाने दूं। यही सवाल कुछ बोलने नहीं दे रहा था।”
अभिनाश – तुम ऐसे चुप नहीं रह सकती, जब कुछ बोलना ही नहीं था तो यहां आने का मतलब ही क्या था। कहो… तुम्हें कहना ही होगा।
“उसके हर शब्द मेरी खामोशी को और मजबूत करते जा रहे थे। क्या कहूँ इसको कि इसलिए यहाँ आयी हूँ क्योंकि फ़िक्र है इसकी मुझे। या क्योंकि इसका हक़ है अब भी मुझ पर। या अगर न आती तो दूसरे दिन खुद को मुँह नहीं दिखा पाती आईने में। क्या कहूँ इसको…”
इसके बाद मैं जागी रही ?…सोई रही ?… खोई रही। खुद को सीधा रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर पाया। किसी से बिना कुछ कहे सुबह की रोशनी से पहले मैं अपना बैग उठाकर चुपचाप निकल गयी थी। एक बार लगा कि बाकी दोस्तों को बोलकर आना चाहिए था। फिर लगा बेवज़ह लोग रोकेंगे और फिर बखेड़ा खड़ा होगा। वापसी की टिकट तो मैं कल सुबह गेस्ट हॉउस पहुंचने के पहले हुए झड़प के बाद ही करवा चुकी थी। कई बार आते वक्त सोचा कि शायद आना ही नहीं चाहिए था। लेकिन अब लगता है की सही किया। न आती तो ज़िन्दगी भर खुद को कोसती रहती। वीकेंड गेटअवे के नाम पर इन दो दिनों में जो सत्य समझ में आया था वो ताउम्र होशियार रखेगा। मैं गयी तो कुछ रिश्तों के भीड़ में अकेली थी पर वापस सिर्फ खुद के साथ आ रही हूँ।
मैं गलत थी हो सकता है पर यह इज़ाज़त नहीं देता है कि कोई रिश्तों की मर्यादा लाँघकर मेरे आत्मसम्मान को खिलौने की तरह इस्तेमाल करे। उस वक़्त इसलिए भी चुप रही क्योंकि कुछ बोलने का कोई फायदा नहीं था। उसके अंदर के कोलाहल में मेरी आवाज़ कोई मायना नहीं रखती। उल्टा उस शोरगुल को और बढ़ा देती। खामोशी हर दफ़ा कमज़ोर नहीं होती। मर्दो को ये समझने में काफी समय लग जाता है।
इस पूरे डब्बे में लिंग अनुपात निसंदेह ज़ाहिर कर रहा था कि चाहे हम प्रगतिशील होने का कितना भी दंभ भरे लेकिन आज भी निम्न और मध्य वर्ग की महिलाओं को बिना झिझक द्वित्य श्रेणी में सफर करने का साहस जुटाने में काफी समय लग जाता है। डब्बे में कोई सीट खाली न थी लेकिन कुल मिला के महिलायों की संख्या दस से ज्यादा न होंगी। उसमे भी मुझे संसय ही नही अपितु पूर्ण विश्वास है कि शायद ही कोई और लड़की अकेली मेरी तरह सफर कर रही हो।
ऐसा क्या बदल गया इस वापसी के सफर में। आते वक्त यही ट्रेन थी ऐसे ही लोग थे और मैंने भी ऐसे ही कपड़े पहने थे और तो और टिकट भी तत्काल की ही थी और वो भी साइड अपर बिल्कुल अभी की तरह। बस अभिनाश के साथ न रहने से कितना कुछ बदल गया था। तब तो ऐसा महसूस नहीं हो रहा था। वस्तुओं के समूह जैसा महसूस होता है। चलती-फिरती शो-केस। लोग अपने पसंद के हिसाब से ऊपरी-निचली सेल्फ़ की अंदाज़-ए-फरोख्त करते है। अभी शो-केस की निगरानी करने वाला कोई नहीं।
ये ही पुरुष जब अपनी किसी महिला मित्र या परिवार जनों के साथ होते है तो जिस भावना में ज़िम्मेदारी और सुरक्षा होती है। वही अकेले होने पर मौके में बदल जाती है। वैचारिक संकीर्णता …नहीं न.. न…ना …सिनेमा का दुस्प्रभाव और कच्ची उम्र में विपरीत लिंग से मेलजोल का अभाव। एक स्तर के नीचे के तबके में बड़ी छोटी उम्र से ही बच्चों को लिंग बोध करा दिया जाता है और कई दकियानूसी गैरजरूरी अंतर संप्रेषित कर दिए जाते है।
फलस्वरूरप एक आयु विशेष तक जिस चीज़ तो अस्पृश्य जताया जाता है वो शारीरक बदलाव के साथ अचानक एक अलग ही खिंचाव में तफदिल हो जाती है। अब इस असमंजस में लड़का-लड़की समझ ही नहीं पाते है कि क्या गलत, क्या सही। इसी अभाव की पृष्ठभूमि में उनकी सोच जवान होती है। अमूमन लड़कियों को ढालने का पारिवारिक साँचा समाज की सदियों से चली आ रही दकियानूसी प्रथाओं पर आधारित होता है। इसमें खासकर से लड़को से मेल-जोल को बुरा माना जाता है।
लड़कों को साँचे में नहीं अपितु एक अनगढ़ मूर्ति की तरह समाज के हवाले कर दिया जाता है। समाज जाने अनजाने में कब इसको तराशना शुरू करता है इसको खुद भी पता नहीं चलता। हाँ समय-समय पर इसका आंकलन भी जारी रहता है। मूर्ति खूबसूरत बनी तो समाज की वाहवाही और अगर खराब बनी तो परिवार की जिम्मेदारी।
टर्र-टर्र-टर्र…. ट्ररर..ट्ररर..फ्रूटी…पेप्सी…लिम्का…बिसलेरी…।
ठंडा पानी… बीस रूपया… बीस रुपया…।