नारीत्व और नारीवाद 

बारहवीं क्लास में पहुंचने के पहले ही मेरी बहने, बढ़िया खाना बना लेती थी। रोटियां एकदम गोल, आप चाहे तो गोलंबर से नाप सकते थे। सिलाई, कढ़ाई, बुनाई के साथ क्रोसिया का काम भी उन्होंने खेल-खेल में सिद्धस्त कर लिया था। अपना सलवार सूट सिलने के साथ-साथ मम्मी की साड़ी में फाल लगाना, पापा और मेरी कमीज-पैंट की छोटी-मोटी मरम्मत, बैग की स्लिप हुई चेन पर मोम घसकर या दांत से उसकी क्लिप दबाकर ठीक कर देना, उनके लिए आम बात थी। तीज-त्योहार के मौके पर मम्मी की परंपरागत पाक कला को धत्ता बतलाकर अपने आधुनिक प्रयोगों से सबकी वाह-वाही जीत लेना। घर के लगभग सारे काम-काज, साफ-सफाई, हिसाब-किताब से लेकर पड़ोसियों तक घरेलु सामान का आदान-प्रदान, सुनियोजन किशोरावस्था को पार करने के पहले ही इन्होंने बखूबी अंजाम देना शुरू कर दिया था।

यह मज़बूरी नही थी। यह संस्कार थे। ऐसा नही इन कामो को करने के लिए इन्हें डाँट-फटकार नही सुनना पड़ता था। लेकिन यहां कौन है जिसने स्कूल में सबक सीखते समय अध्यापकों की अमृतवाणी का स्वाद नही चखा है। तो घर पे इतना कुछ सीखते समय थोड़ी- बहुत कहा-सुनी को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। पहली गुरु माँ होती है और पहला बॉस बाप।

मुझे साफ याद है कि ट्यूशन वाले मास्टरजी और आस-पड़ोस के पढ़े-लिखे लोग जो यदा-कदा घर में अवतरित होते थे, ने कभी भी मेरी पढ़ाई-लिखाई को लेकर प्रशंसा नही की। जहां मेरी हैंड-राइटिंग को मच्छर की टांग सरीखा देखा जाता था वही दीदी के कलम से उनके हिसाब से मोती उगले जा रहे थे। ईर्ष्या होना स्वाभाविक है मेरा बचपन इससे अछूता नही था लेकिन बड़े होने पे वही ईर्ष्या कौतूहल और फिर सम्मान में बदल गया। वास्तव में दीदी की लिखावट पन्नो पर नक्काशी की तरह दिखते थे।

हालाँकि बारहवीं तक पहुंचते-पहुंचते रोटियां मैं भी गोल बना लेता था। पर उनके फूलने, न फूलने पर मेरा कोई नियंत्रण न था। इस कला में निपुणता पाने में करीब 5 वर्ष और लगे। मैं रोटियों को पाक कला के पैमाने की तरह तरह देखता हूँ। वस्तुतः अगर आपको रोटियां बनानी आती है और दाल, सब्जी में नमक का अंदाज़ा है तो आप सम्मान के हकदार है। आपने एक ऐसा हुनर सीख लिया है जिसके पीछे सैकड़ो वर्षो का इतिहास है। आज के दौर में अनगिनत ऐसे युवा मिल जाएंगे जिनको चावल में कितना पानी डालना है तनाव का कारण जान पड़ता है। पढ़ी-लिखी आधुनिक युवतियां इसे क्यूट कहती और समझती है। इससे पहले की सारा नारी समाज मुझ पर टूट पड़े मैं साफ कर दूं मेरा इशारा बस उन तक सीमित है जिनसे मेरा परिचय है। और जिनको मैंने ऐसा कहते देखा सुना है।

पुनः रुख अपनी बहनों की तरफ करता हूँ। मैं बहुत छोटा था जब मेरी बड़ी दीदी मुझे रात को दो बजे आटे के रसगुल्ले बनाकर खिलाती थी ताकि मैं चुपचाप सो जाऊँ। त्याग और स्नेह वह सीमेंट है जिससे परिवार सुदृढ़ता से आपस में जुड़ा होता है। और ये दोनों ही एक नारी की जन्मजात विशेषतायें कही जाए तो अतिसयोक्ति न होगी। जिस सहिष्णुता और धैर्य के साथ मैंने अपनी ही नही बल्कि कई माताओं और बहनों को समस्याओं के साथ मुस्कुराते हुए जूँझते देखा है वो सिर्फ काबिले तारीफ ही नही अपितु पूजनीय है। कुछ सोच कर ही स्त्रियों को हमारी हज़ारों वर्षो पुरानी संस्कृति में देवी का दर्ज़ा दिया गया है।

दुःख तब होता है जब आज महिला सशक्तिकरण के तथाकथित फार्मूले पे अपनी और अपने जैसी उन बहनों, माताओं और मित्रों को फिट बैठते नही देखता। ये बड़ी लाल बिंदी, चौड़ी पार वाली आर्गेनिक साड़ी पहने नकली बुद्धिजीवी वर्ग को, नारीत्व के नाम पर पश्चात्य ढोंग से भरी मनगढंत बे-सिर-पैर की विचारधारा से युवा पीढ़ी की मानसिकता दूषित करते देखता हूँ तो और भी दुःख होता है।

मैं इस बात का समर्थन बिल्कुल नही करता कि दसकों से जो चलता आ रहा है वो सब सही है और नई हर चीज़ गलत है। बदलाव प्रगति की प्राथमिक शर्त है लेकिन क्या बदलना चाहिए यह किसी खास वर्ग की निज़ी सहूलियत की तर्ज़ पर निर्धारित नही होना चाहिए। लड़कियों का घर से बाहर निकलना, लड़को के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलना, नौकरी करना, मौलिक अधिकारों में बराबर का हक मिलना, सामाजिक सम्मान का उतना ही हकदार होना जितना कि कोई पुरुष है। अगर नैतिक मूल्यों पर अधिकारो की बात करें तो व्यख्यान बहुत लंबा हो जाएगा। मूल रूप से मेरा कहना है की समान अधिकार होने चाहिए। यह दोनों वर्गो, महिला और पुरुष की जिम्मेदारी है कि दोनों ही अपने कार्यछेत्र में समर्पण का भाव रखे पर साथ ही समाज की बुनियादी इकाई जिसे हम परिवार कहते है कि ज़रूरतों और इसके प्रति कर्तव्यों को नज़रअंदाज़ न करे।

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