लिख के भूल जाना …

लिख के भूल जाना यही तो फितरत होती है।
शायरी कब कहाँ किसी की इशरत होती है।।

भूला दे, न देखे ज़माना, तुमको न समझे।
दुनिया है, सबकी अपनी किस्मत होती है।।

भूले सुबह के शाम हर बार नहीं लौटते।
टूटे घुंघरूओं की अलग ही खनक होती है।।

मिलना- जुलना तो लगा है चलता रहेगा।
कहो बेवफ़ाई की भी कभी हसरत होती है।।

ख़बर फैलेगी होंगे हम भी बदनाम अब।
नाक़ाम इश्क़ की भी अलग शोहरत होती है।।

अदना रहा बर्बाद खुशफहमी-ए-वस्ल में। 
हारी हुई बाज़ी में हर चाल गलत होती है।।

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