नारीत्व और नारीवाद 

ये लाल बिंदी वाली औरते और स्वछंद विचारधारी पुरुष जो “फेमिनिज्म” के उलटे-पुल्टे मतलब निकालकर यहां वहां सोशल मीडिया पर बिखेरते रहते है वो कभी आपके बच्चों के लिए खाना बनाने नही आएंगे न ही आपके कपड़े धोने या घर की साफ-सफाई करने। ये बस अपनी नेतागिरी झाड़ने और अपना उल्लू सीधा करने के लिए परिवारों में फूट डालेंगे। फुट डालो और राज करो कि नीति ट्राइड-एंड-टेस्टेड है। अगर वो फूट डालने में कामयाब हो गए तो राज करना कोई बड़ी बात नही। इतिहास गवाह है इस कूटनैतिक पद्धति में नुकसान हमेशा सम्मिलित इकाइयों को ही हुआ है और फुट डालने वालों का फायदा। ज़रूरत है सजग रहने की, ऐसी घटिया सोच का विरोध करने की, समझदारी के साथ नए परिवर्तनों को अपनाने की और साथ ही दकियानूसी विचाधाराओं (जिनका शायद भूतकाल में तार्किक महत्व रहा होगा पर अब वर्त्तमान में अपभ्रंश होकर केवल ढोंग रह गया है) का त्याग करने की।

“फेमिनिस्म” शब्द को जितना गलत समझा गया उससे भी ज्यादा इसको गलत समझाया गया। मेरा कहना है कि क्या सिर्फ आधुनिक महिलाएं जो हर बात में बिना सोचे समझे पुरुषों की बराबरी करना चाहती है। चाहे पुरुष गलत ही क्यों न कर रहा हो, ही अपने आपको सशक्त महिला के रूप में देखती है। सिगरेट पीना, शराब पीना, देर रात सड़को पर तमाशा करना किसी भी लिंग या वर्ग के लिए सराहनीय नही है। और जो गलत है सबके लिए गलत है। चाहे वो लड़का हो या लड़की, हर इंसान जिसका पेट है, भूख लगती है, उसको कम से कम साधारण खाना बनाना आना चाहिए। यह उसी तरह से है जैसे आप सुबह उठकर दांत साफ करते है, बाल सवाँरते है, और अन्य दैनिक क्रियाएं करते है। इसमें लज्जा जैसी कोई बात नही अपितु गर्व होना चाहिए। इसका किसी लिंग विशेष से कोई लेना-देना नही।

फिर लोग पूछेंगे की घर का काम-काज स्त्रियों के हिस्से में कैसे आया। अगर आप पारिवारिक अलगाववादी विचारधारा जहां स्वछंदता के नाम पर एकांकी प्रयोजन को समूह के सम्मिलित रुचि के आगे रखे जाने की वकालत की जाती है के दायरे से बाहर निकलकर देखेंगे तो बिल्कुल ही स्पस्ट है। स्त्रियों को कुदरत ने ऐसी नियामत दी है जिसकी बराबरी पुरुष कुदरती तौर पे चाहकर भी नही कर सकते। वो है शिशु को गर्भ में धारण करने की और जन्म देने की।

जब शुरुआती सभ्य समाज का गठन हुआ तब पारिवारिक श्रमविभाजन निर्धारित करते समय काबिलियत, कुदरती छम्यता और सहूलियत इन सभी बातों का खयाल रखा गया होगा। अपितु यह व्यस्था शायद कोई सोचा-समझा निर्णय न होकर कालांतर में स्वाभाविक रूप से फलीभूत हुआ प्राकृतिक चुनाव होगा। इस व्यस्था को प्रारंभिक पुरुष वर्ग ने समाज और परिवार पर ज़बरदस्ती थोपा नही था।

जहां औरतों का गर्भावस्था और जन्मोपरांत शिशु के साथ रहकर उसका अपने दूध से लालन-पालन करना अनिवार्य ही नहीं बल्कि प्राकृतिक मर्यादा थी वहीं पुरुष भी अपना और अपने परिवार के लिए खाना जुटाने हेतु बाहरी कार्यों के लिए बाध्य था। समय से साथ दोनों वर्ग अपने-अपने कार्यों में कुशल से कुशलतम होते चले गए। जहाँ पुरुषों ने शिकार करने के लिए मजबूत मांसल शरीर और अचूक निशाना विकसित किया वहीं महिलाओं ने खाद्यान्न परिरछन और वस्त्र निर्माण कलाओं में निपुणता प्राप्त की। बच्चे जब बड़े हुए तो लड़को को पिता के साथ शिकार के गुण सीखने जाना होता था और लड़कियो को घर के काम-काज में माँ का हाथ बटाना होता था। यह सहजीविता कहलाती है शोषण नहीं। इस व्यवस्था के लिए किसी भी एक वर्ग को दोषी ठहराना गलत है।

कालांतर में समाज की बनावट बदली और जीविकोपार्जन तुलनात्मक रूप से ज्यादा सुलभ हो गया। या कहे तो शारीरिक श्रम और अनियतता कम हो गयी। खासकर से शहरों में जहां रोजगार के विभिन्न माध्यम उपलब्ध है ये ज्यादा स्पस्ट समझा जा सकता है। रोजगार की प्रकृति भी ऐसी है जो महिलाएं एवम पुरुषों को समान अवसर प्रदान करती है। इतना ही नही ऐसे संसाधन भी उपलब्ध होते है कि नाभिकीय परिवार भी सहजतापूर्वक अपने परिवार के छोटे सदस्यों के भरण-पोषण के साथ अपना पेशा भी जारी रख सकते है। किन्तु गाँव का समाज आज भी पुराने श्रम विभाजन के आधार पर टिका हुआ है और आदर्श हालातों में फल-फूल भी रहा है। इस सत्य से आंख नही मूंदना चाहिए।

काफी समय तक एक प्रचलित अवधारणा के अंतर्गत ऐसा भी माना जाता रहा था की अंग्रेज़ो के आगमन से पहले भारत एक अल्हड़, फूहड़, अव्यावस्थित समाज था जहां सिर्फ पाखंड था। उच्य वर्गो/वर्णो के द्वारा निन्म का शोषण होता था। ये बात आंशिक रूप से सही भी थी लेकिन इसे साधारण मानकर हमारी सभ्यता-संस्कृति का मजाक बनाया गया। पुरानी कहावत है “गेंहू के साथ घुन भी पिसता है”। लेकिन इस पिसाई में घुन के साथ गेहूं पीस गया। बेबुनियादी तर्ज़ पे अंग्रेज़ो ने अपना किरदार व्यपारियों से बदलकर शासकों में परिवर्तित कर लिया और पूरे भारत को गुलाम बनाकर हमें जीने के पाश्चात्य नुस्खे सिखाने के नाम पर लूटते रहे। हम आपस में लड़ते रहे वो अपना काम करते रहे।

अगर आंखे खोलकर ध्यान से देखें तो यही पैटर्न साफ दिखेगा जब फर्जी आध्यात्म का दंभ भरने वाले किसी भी तरह से लोकप्रिय श्रेणी में खड़े कुछ लोग सिर्फ और सिर्फ अपने फायदे के लिए समस्त नारी वर्ग के विचारों में ज़हर घोलने का काम करते है। “नारीवाद” के नाम पर उन महिलाओं को उकसाया जाता है जिनका इनको लेश मात्र भी अंदाज़ा नहीं है।

वातानुकूलित आवास, होटलों, वाहनों में सफर करने वाले ये लोग त्याग, बलिदान की मूर्ति, सहिष्णुता की पराकाष्ठा और नारी के नारीत्व के आदर्शो का निर्धारण करने के योग्य नहीं। बस इतना कहना चाहता हूँ। हर बेटी, पत्नी, माँ को पूरा अधिकार है कि वो नारीत्व की कैसी परिभाषा दुनिया के सामने रखना चाहती है। इसी को मैं “फेमिनिज्म/नारीवाद” समझता हूँ।

फर्जी बुद्दिजीवी वर्ग और नारीत्व के झूठे ठेकेदारों को सूचित हो कि आँकलन करने के लिए आप स्वतंत्र है लेकिन चरित्र निर्धारण करना आप का काम नही। मेरी बहने भी उतनी ही सशक्त है जितनी की कोई अभिनेत्री, डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी नौकरी में कार्यरत कोई और महिला। मुझे हर उस माँ पर जिसने अपनी व्यतिगत आकांक्षाओं में कटौती कर परिवार को ज्यादा महत्व दिया, उतना ही गर्व है जितना कि उस महिला पे है जिसने अपने पेशेवर कार्यछेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त की।

हम सबने नारीत्व देखा है अहसास किया है यकीन मानिए आज के दौर में हमें नारीवाद जैसे मृगमरीचिका की ज़रूरत नहीं। एक दूसरे में विश्वास और प्रेम की ज़रूरत है।

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