ट्रैन खुलने में अभी भी 20 मिनट रहा होगा। मैं मन ही मन तरकीबे सोच रहा था। अपने शरीर को उस ज़रा से खांचे से पार होने की कल्पना कर रहा था। फिर आस पास कुछ बच्चे अपने घरवालों से साथ जाते दिखे तो फिर यूट्यूब का एक वीडियो ज़हन में कौंधा … जिसमे एक 12 साल के बच्चे को उसकी माँ ने पाँचवी मंज़िल की बॉलकनी से चौथी मंजिल की बॉलकनी पर एक साड़ी निकालने के लिए एक दूसरी साड़ी से बांधकर उतारा था। हालाँकि सब कुछ अंततः ठीक से हो गया था। बच्चा साड़ी लेकर सही सलामत वापस आ गया था। लेकिन जिस फ़ोन से वीडियो रिकॉर्ड किया गया था वो सड़क पर सामने वाली बिल्डिंग की खिड़की में था। और वहां कुछ लोग बात कर रहे थे जो वीडियो में रिकॉर्ड हो गया था। उस औरत को इतना कोसा गया था कि क्या कहें। मेरे दिमाग से किसी बच्चे की मदद से ईयर बड निकलवाने की तरक़ीब जाती रही। अब मन इस दिशा में कल्पना करने के लिए भी खुद को कोसने लगा। क्या इतना ज़रूरी था ये ? शायद बात पैसे की नहीं थी। वस्तू मोह की भी नहीं रही थी अब। अब यह हार-जीत की बात हो गयी थी। परिस्थिति से दो-दो हाथ करने की बात। इसकी तो आदमी की आदत पड़ गयी होती है। तो आप कह सकते है कि आदतन आप समाधान तलाशने में जुट जाते है खासकर के तब जब आप माध्यम वर्गीय परिवार का इंजन नए नए बने हो। आप दिन रात सुबह शाम यही तो कर रहे होते है। तो यहाँ कैसे इतनी जल्दी हार मान ली जाए।
आप नौकरीपेशा हो और मध्यम वर्ग से ताल्लूक रखते हो तो आपके अंदर एक कुंठित एंटरप्रेन्योर सुशुप्त रहता है। कई बिज़नेस आइडिया जब-तब आते जाते रहते है। ये विचार दोस्तों के साथ मज़लीशो में मदिरा सेवन पश्चात चटक हो उठते है। दिमाग हज़ारो समीकरण बैठाता रहता है। नफ़ा-नुकशान… अरमान! आह। जिन वाणिज्य चेस्टाओं को आपके बॉस बेदर्दी से कुचल चुके होते है उन कपोल-कल्पनाओं को आप अन्य सभी जगहों पर वास्तविक सफल सूत्रों में परिवर्तित करने की कोशिश करते रहते है। मेरे अंदर का सुशुप्त व्यापारी अब समस्या को धंधे की तरह देख रहा था। अब यहाँ भावनाओं का कोई काम नहीं था। रिस्क असेसमेंट होने लगा। रिटर्न ऑफ इन्वेस्टमेंट कैलकुलेशन चलने लगा। सब सोंचने के बाद तय हुआ कि 2 हज़ार के एसेट को बचाने के लिए 10 परसेंट का खर्च किया जा सकता है। मतलब की 200 रुपया।
अब बजट तय था। लेकिन सबसे बड़ी समस्या थी सटीक टैलेंट का मिलना और उसका काम करने के लिए निर्धारित बजट में मान जाना। स्टेशन में पैसे के लिए कौन लोंगो की मदद करता है? इस प्रश्न का उत्तर तुरंत ढूंढना ज़रूरी था। और उत्तर अतिशिघ्र मिल भी गया। लाल कुर्ते में सिर पर सामान लाधे कई कूली प्लेटफार्म पर इधर-उधर भाग रहे थे। अब ट्रैन का समय भी होने वाला था। करीब 10 मिनट बचे होंगे। मेरी नज़र यात्रियों को बिठा कर वापस जाते खाली कुलियों पर थी। 4-5 कुलियों की शिनाख्त नज़रो से की जा चुकी थी। पर कोई सटीक डील-डौल वाला नहीं दिख रहा था। किसी का पेट बाहर तो कोई उम्र दराज़। मुझे छोटे कद के छरहरे नौजावन की तलाश थी जो रिस्क लेने में सक्षम हो।
नज़रे उचित कुली की तलाश में और दिमाग में दूसरे तरीके चल रहे थे। अगर चाबी में रस्सी बांधकर ईयर बड चिपका के खींचा जाए तो… उसमे स्पीकर है तो चुम्बक भी होगा। पर इतने छोटे से ईयर बड में क्या ज़रूरत के हिसाब से शक्तिशाली चुम्बक होता होगा। ओह…आइडिया। पर्स से तुरंत चाबी निकाल के कान में लगे ईयर बड से चिपका कर टेस्ट किया गया। ये प्रयास विफल रहा। चाबी में ये उतनी मज़बूती ने नहीं चिपक रहा था। शायद इसकी धातू में रांगा ज्यादा रहा होगा।
ओ..भैया… ओ..ओ..भैया जी.. सुनो। एक फुर्तीला, कम कद का नौजावन कुली दौड़ते हुए सीढ़ी चढ़ रहा था। मैंने उसके पीछे लगभग दौड़ते हुए जोड़ से आवाज़ लागाई। आसपास के शोरोगुल में मेरी आवाज़ उस तक पहुंच नहीं रही थी। मैं उसके पीछे 4-5 सीढियां भी जल्दी-जल्दी आवाज़ देते हुए चढ़ गया। ऊपर से आती एक महिला ने कुली को इशारा करते हुए मेरी तरफ दिखाया।
वो पलटकर सीढ़ी से उतर कर मेरी तरफ बढ़ने लगा। मेरी उम्मीद प्रबल होने लगी। जैसे ही वो पास आया मैंने बिना समय बर्बाद किये उसे अपने पीछे आने तो कह परिस्थिति से अवगत कराया। अब हम दोनों उस जगह पर आकर फाँक से ईयर बड देखकर उपाय सोच रहे थे।
कुली – नीचे घुसकर तो नहीं निकल सकेगा। अब ट्रेन भी खुलने को है।
मैंने कहा – उसमें चुम्बक है कोई लोहे का सरिया मिल जाय तो प्रयास किया जा सकता है।
अभी तक इसकी भाव भंगिमा में वो तत्परता नहीं महसूस हो रही थी। मैंने उससे कहा कि जब ट्रेन चली जायेगी तो क्या इसको उठाकर सामने रेडी वाले को दे सकोगे। फ़िर खुद ही सोचने लगा कि उसका क्या फ़ायदा। फिर मैंने कहा – सुनो, अगर तुम अभी इसे किसी तरह से निकाल दो तो मैं 200 रुपये दूंगा। समय कम था मोल मुलाव करने का फायदा नहीं। तो मैंने आखिरी निर्णय लिया कि यदि ये इतने में मान गया तो ठीक वरना जाने देंगे।
पैसे की बात सुनते ही मानो उस कुली के बदन में विद्युत का संचार ही गया। वो झटक कर पहले रेडी वाले कि दिशा में भागा फिर वहां इधर-उधर हाथ मारने, एक-दो लोगों से बात करने के बाद वापस मेरी तरफ दौड़ता हुआ आया और “रुको यही मैं आता हूँ” कहता हुआ दूसरी तरफ भाग गया। ट्रेन खुलने का समय और करीब आ गया। मुझे अपने कोच तक जाने के लिए कितना समय चाहिए होगा ये सोच रहा था। कब नियति मानकर एस 8 की तरफ दौड़ना है यही सोच रहा था। इस रोमांच की अवस्था में तब तक शांत बने रहना था जब तक वो कुली वापस न आ जाए।
2-3 मिनट का शांत बने रहने के बाद मैं व्याकुलता पूर्वक उस दिशा में देखने लगा और बड़े भारी कदमों से आगे बढ़ने लगा। अब मैंने दिल को दिलासा देना शुरू कर दिया था कि चलो कम से कम अंत तक प्रयास तो किया गया। तभी वो कुली दौड़ते हुए मेरी तरफ आता दिखा। उसके हाथ में लोहे का सरिया था जो आगे से हुक की तरह मुड़ा हुआ था। मैं लगभग एक कोच पार कर चुका था। वो बिना रुके मुझे पार करता हुआ ठीक उसी जगह पहुंच गया जहाँ ईयर बड था। मैं उसके पीछे तेजी से बढ़ चला। मैं सोचने लगा कि इसको ये जगह बिल्कुल सटीक कैसे याद थी। जब तक मैं उसके पास पहुँचता वो प्लेटफार्म पर घुटनों के बल बैठकर सामने झुककर रॉड को खाँचे में डालकर ईयर बड खोजने लगा। मैंने फटाफट फ़ोन के टार्च को ऑन किया और झुककर खाँचे में लगा दिया।
बड़े सधे हाथों से वो दम साधे सरिया खाँचे से वापस खींच रहा था। उसके हुक में ईयर बड चिपक गया था और हिल रहा था। पूरा सरिया बाहर आता इससे पहले ही हाथ बढ़ाकर उसने ईयर बड मुट्ठी में भर लिया। तभी ट्रेन ने सिटी बजा दी। इससे पहले की कुछ बात ही पाती। मैंने सीधा पर्स निकाला और कहा तुम्हारे पास तीन सौ है क्या। मेरी हाथ मे पाँच सौ का नोट था। उसने कहा – आगे खुदरा करवाना होगा। मैंने बिना सोचे उसको पांच सौ का नोट दे दिया। मेरी मुट्ठी में ईयर बड और दूसरा कान में। संगीत अभी भी बज रहा था मैं मंद कंपन अपने हाथ में महसूस कर सकता था। मैं हतप्रभ खड़ा था ट्रेन से दूसरी सिटी मारी।
वो दौड़ता हुआ वापस आया और तीन सौ के नोट मेरी हाथों में पकड़ा गया। फिर उसने पूछा – कौन सा डिब्बा। मेरी मुँह से निकला एस 8। उसने कहा जल्दी जाओ सर। हाथों से इशारा करके कहा उस तरफ है। मैं समान पहुंचा दूं क्या? मैंने कहा नहीं मैं चला जाऊंगा। थैंक यू। “कोई नहीं सर, रोज का काम है। आपकी महंगी चीज़ बच गयी।” मैंने कुछ कहा नहीं और वो वापस तेज़ी से भीड़ में गुम होता चला गया। मैंने अपने डिब्बे की तरफ दौड़ना शुरू किया और दिमाग में चल रहा था। हाँ बहुत महंगी चीज़ बच गयी। उम्मीद बच गयी। अभी और बिज़नेस प्लान्स बनाए जा सकते है। चाहे पैसा ही आवलंब रहे किन्तु ईमानदार और कर्मठ लोग हो तो ऐसे काम हो सकते है जो सबके हित में हो। ईयर बड सेनेटाइज करके वापस दोनों कानो में लगाकर अपनी सीट पर बैठे-बैठे इसमें बज रहे गाने को सुनने की कोशिश कर रहा था पर विगत आधे घंटे का घटनाक्रम मुझे निर्वात में धकेल पुनः अवलोकन के लिए मजबूर कर रही थी। ट्रेन चल पड़ी।
समाप्त।