इयर बड्स…

मैं अब अपने डिब्बे वाले पोल की तरफ प्लेटफार्म की कगार के साथ बढ़ने लगा। जैसे-जैसे ट्रेन का समय हो रहा था लोग बढ़ते जा रहे थे। सब अपने कोच की तरफ वाले डिजिटल डिस्प्ले पोल की तरफ जाना चाह रहे थे। अभी ट्रेन आयी नहीं थी। ट्रेन यहीं से शुरू होकर मुम्बई तक जाती थी। इसलिए यहाँ करीब 30 मिनट खड़ी रहती है फिर भी लोगों को नियत स्थान पर पहुंचने की हड़बड़ी थी। लोग आपस में उलझ रहे थे। सामान घसीट रहे थे। सर पर उठाए थे। एक-दूसरे से टकराते हुए सॉरी-सॉरी करते हुए सब बढ़े जा रहे थे। पर मेरे लिए तो सब मेरे कानों में बजते संगीत की लय पर धीरे-धीरे घटित हो रहा था। सिर्फ सबके मुँह हिल रहे थे मैंने ज़िन्दगी म्यूट कर दी थी। मैं संगीत की धुन के साथ खुद को इस जनसमूह के अंबार से बचाता हुआ अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ा जा रहा था। एकाएक पीछे से आते किसी यात्री के सामान से मेरा बायां कंधा टकराया और झटके की वजह से मेरे बाएं कान का ईयर बड निकलकर प्लेटफॉर्म पर जा गिरा और लुढकते हुए प्लेटफॉर्म के नीचे पटरियों के पास रुक गया। पीठ पर बैग के वजन की वजह से जल्दी से नीचे झुककर मैं इसे प्लेटफार्म से नीचे गिरने से नहीं रोक पाया। पैर से रोकने की कोशिश की थी पर नाकामयाब रहा था। सब इतनी जल्दी हो गया की कुछ समझ ही नहीं आया। 

सबसे पहले तो मैंने सोचा की कोई बात नहीं बैग रखकर नीचे उतर कर ले आऊंगा। फिर मैंने बगल में देखा तो कुछ लोग जो बेंच पर बैठे थे वो मेरी तरफ देख रहे थे। मैं संसय में था कि क्या इन्होंने ईयर बड को निकल कर गिरते हुए देखा होगा। कितना बेवकूफ़ जान पड़ा हूँगा मैं इनको। फ़िर सोचा कि अभी इन बातों को सोंचने से क्या फायदा, पहले ईयर बड को वापस लाने के बारे में सोचा जाए। मैंने बैग उतारने के लिए जैसे ही उँगलियों को कंधे के फीते के नीचे सरकाया दिमाग में पहले कभी देखी किसी यु-ट्यूब वीडियो की याद ताजा हो उठी। उसमें ट्रेन से किसी आदमी को बाल-बाल बचते हुए दिखाया गया था। मैंने बैग उतारने से पहले पलटकर जिस तरफ से ट्रेन आने वाली थी उस दिशा में प्लेटफार्म से झांककर देखा। प्लेटफार्म के छोड़ पर या शायद उससे थोड़ी दूरी पर ट्रेन की हेडलाइट दिखती जान पड़ी। कानों से होकर कंधे के पीछे तक एक सनसनी सी कौंध उठी। जिस यु ट्यूब वीडियो का अभी ख़्याल आया था वो और प्रबलता से साथ मानस पटल पर उभर आया। मैंने नीचे उतर कर इयर बड उठाने का ख़्याल दिल से निकाल दिया। 

मैं अभी तक अपने डिब्बे से दूर था समय अभी भी करीबन आधे घंटे का बाकी था तो मुझे कोई हड़बड़ी नहीं थी। मैंने उम्मीद अभी छोड़ी नहीं थी। मैं वहीं खड़ा कभी नीचे पटरी से लगकर गिरे इयर बड को देखता तो कभी पास बेंच पर बैठे उन लोगों को जिन्होंने शायद इसे गिरते देखा था और बीच-बीच में ट्रेन जिस तरफ से आ रही थी उधर। ट्रेन बहुत धीमे बढ़ रही थी। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ असमंजस में पड़ा सोच रहा था कि संभावनाएं क्या है? मुझे यहां क्या करना है? कभी लगता पल भर की बात है झट से बैग नीचे रखो और कूदकर ईयर बड उठा लाओ। छोटी सी बात है। लड़कपन में मैंने अनेको बार प्लेटफार्म जम्प किया है। आज भी कर सकता हूँ पर क्या वो अब बचपना न होगा। हाँ ट्रेन बहुत धीरे चल रही है या शायद ऐसा प्रतीत हो रहा हो। क्या पता। ये लोग मुझे क्यों देख रहे है ? देख भी रहे है कि नहीं ? क्या ये वही लोग है जो पहले यहां बैठे थे? मुझे इनके चेहरे तो वैसे ही लग रहे है। क्या इतनी जल्दी चेहरे याद हो जाते है ? 

सिर्फ 2 हज़ार के इयर बड्स… तो एक का तो 1 ही हज़ार हुआ…पर एक के बिना दुसरे का क्या काम… हाँ फ़ोन पर बात की जा सकेगी लेकिन संगीत का आनंद कहाँ। दूसरा ले लिया जाएगा। पर ये तो आसान तरीका है। और ये जो बच गया है उसका क्या जब नया आ जायेगा। अनेको ख़्याल एक-एक करके तेज़ी से कौंधने लगे और ट्रेन की नज़दीकी के साथ इनकी रफ्तार तेज़ से तेज़तर होने लगी। सारे ख़्याल समानांतर तैरने लगे एक दुसरे को पछाड़ने की होड़ में लग गए। मैं न जाने क्यों आगे बढ़ गया। शायद मैंने नियति की मान ली थी। ट्रेन मेरे समीप से होकर आगे निकल गयी। अब वापस जा कर उसे उठाने का सवाल ही नहीं उठता। 

10-15 कदम ही आगे बढ़ा हूँगा उस जगह से जहां ये वारदात हुई थी। मेरी एक कान में बचा ईयर बड अभी भी बज रहा था। मुझे अब जाके इसका अहसास हुआ था। क्या वो वाला अभी भी बज रहा होगा? नीचे अँधेरे में पड़ा अपनी अंत से अनिभिज्ञ। बस कुछ कदम और… फिर हमेशा के लिए उस निष्प्राण वस्तु का सांसारिक उद्देश्य समाप्त। अभी कुछ देर पहले ही कि तो बात है इसके कारण ही तो मैं इस भीड़ के उदंड शोरोगुल में भी स्वयं को कितना सौभाग्यशाली समझ रहा था। आह… हाय। मेरी चाल धीमी हो चली। मैं पलटकर तो नहीं देख रहा था पर मेरा ध्यान उस नियत जगह न भूल जाने की चेस्टा में लगा रहा। ट्रेन धीमे-धीमे मेरी बगल से मुझे चिढ़ाती हुई चली जा रही थी। मैं असहाय…नहीं… अरे। ट्रेन के दो डिब्बो के बीच एक आदमी के उतरने तक कि जगह रहती है। रेलवे कर्मचारियों को मैंने बहुत बार दो डिब्बों के बीच जाकर काम करते देखा है। नज़रे गुजरती ट्रेन के डिब्बों  के बीच के खाँचो पर टिक गए और कदम रुक गए। मैं मुड़कर वापस उस जगह की तरफ बढ़ चला जहां मैंने ईयर बड खोया था। 

ट्रेन बहुत धीमी रफ्तार से बढ़ती जा रही है अब काफी धीरे हो चली है लगभग रुकने वाली है। प्लेटफार्म और ट्रेन की बॉडी के बीच से पटरी के समीप मैं ईयर बड खोजने में लगा था। मिल गया। वो रहा। ये क्षणिक खुशी हताशा में तफदिल होने में ज्यादा वक्त न लगा। जिस तुरुप के इक्के की मुझे तमन्ना थी वो मेरे हाथ न लगा। ट्रेन ऐसे रुकी की एस 1 कोच के ठीक बीच में वो जगह आयी जहाँ ईयर बड दिख रहा था। मेरे दुसरे ईयर बड में कोई गाना अभी भी चल रहा था लेकिन मेरे दिमाग में गुलाम अली साहब की गाई वो ग़ज़ल चल रही थी ” फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोंचा न था …”। 

जारी है…

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