मर्ज-ए-इश्क़

वक़्त के पहियों में पावं डालकर घिसटा था मैं बहुत देर तक इसके साथ घूमने से पहले। तब मेरी कराह का मज़ाक उड़ाया था तुमने। मैं रुका था, इतना रुका था, कि समय भी चिढ़ गया था मुझसे। कहता था, ऐसे खंरोंचों से तुम्हें क्या मिलेगा। रोज एक ही ज़ख्म छीलते हो, देखता हूँ और दवा की उम्मीद में किसका मुँह ताकते रहते हो? आओ कुछ देर मेरे साथ चलो बिना यादों की बैसाखियों के। मैंने बहुतों को चलना सिखाया है। दौड़ना सिखाया है। कुछ तो इतना आगे निकल गए कि उड़ने लगे। मुझे भूल गए। पर मैंने कभी बुरा नहीं माना। तुम्हे भी नहीं मानना चाहिए।

ये जो उड़ते है ना उनको ज़मीन पड़ आना ही पड़ता है। अगर चाहते हो कि जो उड़ गया वापस आये तुम्हारे पास तो अपनी ज़मीन बड़ी करो। इतनी की उस पंछी को और कोई जगह दिखाई न दे उतरने के लिए। फिर एक दूसरा भी तरीका है कि तुम भी उसके पीछे-पीछे उड़ते रहो। उसे थका कर हार मनवा लो।

मैं समय से कहता फिर। तुम भी वही बात कर रहे हो। हार-जीत। और तुम्हे तो वैसे भी जीतने की आदत पड़ गयी है। चलो बताओ मुझे पिछली बार किसके साथ बैठे थे और भूल गए थे कि आगे भी बढ़ना है। कुछ तो हुआ होगा। तुम्हारी अनवरत दौड़ में जलन की बू आती है। किससे भागते फिरते हो। कहीं किसी का पीछा तो नहीं कर रहे तुम भी। रुकते क्यों नही। बड़ा घमण्ड है अपनी चाल का तुम्हें।

मुझे तो दया आती है कभी-कभी। आह। कभी आओ रुको एक पल ज़रा मेरे साथ उस शाम के अवशान पे जहाँ तिमिर सूरज के रुपहले किरणों को सनै-सनै अपनी घटाओं में समेट लेता है। जब पंछियों के झुंड कतार में आकाश की लालिमा में खोते चले जाते है। रुको एक पल मेरे साथ वहां उस छन में जब बारिश की पहली बूंद मिट्टी पे पड़कर फैलती है और गुम हो जाती है। रुको कुछ देर वहां और देखो उस प्रयास को जब बूंदों का लगातार समर्पण उनको सफल बनाती है और ज़मीन आखिर पानी को अपने ऊपर बहने देता है।

फिर समय बोलता। तुम्हे ऐसा क्यों लगता है की मैं उन जगहों पर नहीं होता जहाँ की तुम बात कर रहे हो। यही तो है जो दुःख का कारण है। तुम चलते भी इसलिये हो कि मंज़िल मिले और रुक सको। मैं रुकने के लिए नहीं चलता। चलने के लिए चलता हूँ। जो तुम्हारा अंत के साथ संबंध है वही मेरा अनंत के साथ है। अक्सर देखा है तुम्हें स्वार्थ को प्यार साबित करने में मेरी दुहाई देते हुए। तुमसे न स्वार्थ सिद्ध होता है न प्यार। मुझे देखो, मैं इतना स्वार्थी हूँ कि प्यार करने की ज़रूरत ही नही पड़ती। तुम्हें पड़ती है।

मैं समय से फिर एक बार कहता। ठीक है ठीक है। इस बार फिर तुम्ही जीते। चलो थोड़ी देर के लिए पैर हटा लेता हूँ पहिये से। वैसे भी तुम्हारी गति कहाँ कम हुई है इससे कभी। तुम्हे क्या बताऊँ। ये अड़ियलपन बस ऐसे समझ लो कि एक मर्ज पाल रखा है जिसकी दवाई खुद बनाने की आदत पड़ गए है। और दवाई चाहे कितना भी लाभकारी क्यों न हो किसी को इससे प्यार तो हो नही सकता। तो हमारे हिस्से में एक मर्ज का इश्क़ आया है। वही करते जा रहे है।

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