लहू का गुलाब

ज़हन में अंधेरा, बाहर चाँदनी, बदन में आग है।
परवाना अंधा, समां रोशन, लहू का गुलाब है।।

जो धंसा यूँ नस्तर उनके निगाहों का दिल पर।
वो समझते कि जैसे बस उनका ही रुबाब है।।

बेअदब धड़कन, लाइलाज़ उलझन, सर्द रात है।
जुगनू चम-चम, बेख्याल मन, सवाल-ए-हयात है।।

अलसायी पाजेब की छन-छन उकसाती है मन को।
गुनाह मेरा भी बराबर है सिर्फ तेरी न ये करामात है।।

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