रुमाल

बड़ी उसनती सी गर्मी है। बिजली जाते ही मानो संसार थम जाता है। ऐसी निःस्तब्धता निर्जीव में भी जान डाल देती है।

सामान्यतः सूती कपड़े का एक चौकोर टुकड़ा। सादा, रंगीन, बेल-बूटेदार या सजीला किनारी वाला, विविध रुपों में सहजतापूर्वक हर जगह उपलब्ध। दाग-धब्बे समेटे हुए तो कभी सुगंधित इत्र की महक से गमकता हुआ। किसी के पॉकेट से मुचरा हुआ छुपता-छिपाता निकला कभी मैं, तो कभी सीना ताने मानों ज्यामितिक सुत्रों से निर्धारित किये क्रीज़ पर करवट बदलता, अकड़ता हुआ। कुछ की ज़रूरत हूँ कुछ ऐसे ही रख लेते है तो कइयों की आदत में पान की तरह शामिल हो गया हूँ।

अपने किसी कोने में कढ़ाई के धागों से उभरते नाम में, सुई का हर बार आर-पार गुजरना, काँपते हाथो का अस्पस्ट अहसास, साफ महसूस किया है मैंने। जब रुमाल पे कोई किसी के लिए कढ़ाई के धागों से अपना दिल टाँक रहा होता है तब न पूछो की मैंने क्या-क्या न देखा है। आदमी को आईना बनते देखा है। होंठों पे मुस्कुराहट, आँखों पे पानी, गालों में गुलाबी और चेहरे पे लाज देखा है। गर्व से तनी भवे, मस्तक पे स्वाभिमान और ममतामयी आँखों में उसका सरताज़ देखा है। मिलन की बेक़रारी, नए प्यार की खुमारी और सारी दुनिया से छिपा राज देखा है।

अजी जो इश्क़ “रुमाल” में होता है वो टिसू पेपर इस्तेमाल करने वाले क्या खाकर समझ पाएंगे। इस्तेमाल किया और फेंक दिया। रुमाल यादगारी होती है। पानी मैं गिरे टिसू पेपर की हालत देखी है कभी। ऐसी दयनीय अवस्था देखकर सोंचता हूँ कैसे इस छुई-मुई जैसे छन भंगुर वस्तु ने मुझ जैसे बलशाली को परास्त कर दिया। लगता है लोगो ने अब दिल लगाना बंद कर दिया है। वैसे मेरी तो पानी के साथ भी तो खासी दोस्ती है। धूप भी फायदा ही करती है। धो डालो, सूखा दो, स्त्री कर डालो, फिर नया चकाचक! मेरी और टिसू पेपर की क्या बराबरी।

कोट की जेब से बाहर झांककर मैंने तुम्हारी शान बढ़ाई है। चोट लग जाने पर पट्टी बनकर तुम्हारे घाव सहलाये है। कड़ी धूप में तुम्हारे सर को ढका है। चिपचिपाती गर्मी में, गर्दन के पीछे लिपटकर तुम्हारे पसंदीदा शर्ट को बचाया है। इतना ही नहीं, ज़रा याद करो… जब उससे बात करने का कोई ज़रिया नहीं मिला था तो गुफ्तगू शुरू करने का बहाना भी मैं ही बना था। “एक्सक्यूज मी ! शायद आपका रुमाल गिर गया है।

कलाई पर लपेट कर तुमने दोस्तो के बीच उस्तादी दिखाई। आंखों पर बांध कर खेल का हिस्सा बनाया। कहो… क्या इससे इनकार करोगे की कितने ही बार दुःखते सिर का दर्द बाँधा है तुमने मुझसे। तुम्हारे उसके लिपस्टिक के दाग से लेकर बीयर के झाग तक, सब पोछा गया है मुझसे। अब यही बता दो मुझसे ज्यादा आँसू भी पिया होगा क्या किसी ने। बताओ ज़रा…

फिर भी तुमने कभी मुझे नज़रे भर के उस तरह से नहीं देखा जैसे कि सफेद स्ट्राइप्स वाली लाल टाई को देखते हो। कोण बदल-बदल के, बत्ती जला-बुझा के, आईने के सामने। सिर्फ लटका ही तो रहता है और फायदा ही क्या है इसका। कभी कहीं फँसकर खींच जाए तो जान पर बन आये। किसी काम तो आता नहीं, उल्टा तंग ही करता रहता है।

अब वर्मा जी के डिनर पार्टी की ही बात ले लो। तुमने बाकायदा इसको मोड़कर पॉकेट में रखा था। फिर भी ये ज़रा सा झुकते ही छलाँग लगाकर सब्जी में कूद पड़ा। ऐसी उदंडता। आसपास के लोग भी देखने लगे थे। वहाँ भी बीच-बचाव के लिए मेरी कुर्बानी दी गयी। मुझसे तुम्हारा रिश्ता अलग है हाथ-मुँह पोछो चाहे जो करो। लेकिन उस निर्मुहे टाई पर रगड़कर कलेजा छिल दिया तुमने।

वो क्या है न कि मैं तो सुपर मार्केट से नब्बे का आधा दर्जन लाया गया हूँ। मेरी किस्मत अलमारी के भीतर फोटो अल्बम में रखे, कशीदे वाली रुमाल की जगह पाने की कहाँ। मुझे से अच्छा तो ये टिसू पेपर ही है। एक इस्तेमाल में खत्म। कम-से-कम रोज की ये ज़िल्लत तो नहीं सहनी पड़ती।

मल्टी यूटिलिटी हैंगर में लटका जाने क्या-क्या सोचता रहता हूँ मैं भी। तुम्हे अलमारी के शीशे में टाई ठीक करते देखा तो रोक नही पाया खुद को। पर जब तुम्हे कभी अकेले में फ़ोटो एल्बम के उन रुमालों वाले पन्नो को पलट-पलटकर निहारते देखता हूँ जो तुम शान से मौका-बेमौका मेहमानों को दिखाते हो। और दिखाते वक़्त गोमती की आँखों में एक नज़र चोरी से देखते हो। तब समझ में आता है कि मल्टी यूटिलिटी हैंगर से फोटो एल्बम तक के सफ़र में माँ का मोह, बहन के स्नेह और बीवी के प्यार की दरकार होती है।

सामने बालकनी में गोमती अपने पति के लिए लाये नए रुमाल पर बेल-बूटे काढ़ रही है…बिजली वापस आती है और पंखा तेजी से घूमने लगता है तेज़ हवा में फड़फड़ाता हैंगर में लगा, लगभग सूखा हुआ, थोड़ा कम सफेद रुमाल क्लिप से छूटकर तैरता हुआ दरवाजे से लगे पैर-पोछने ऊपर जा गिरता है।

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