मैं पुरुष हूँ।

हाँ..मैं देखता हूँ तुम्हें। घूर-घूर देखता हूँ। तुम अच्छी लगती हो। तुम…सब अच्छी अच्छी लगती हो। जानता हूँ लोग अलग-अलग बातें करेंगे। न जाने क्या-क्या करार दिया जाएगा मुझे, पर सच में तुम सभी अच्छे लगते हो। तुम्हें देखने को मन करता है। तुम्हें जानने का मन करता है। तुम रमणीय हो।

मेरी नज़र ख़राब है ये मुझे पता नहीं, लेकिन मैं तुम्हें मौके-बेमौके देखता हूँ देखकर महसूस भी करता हूँ। कौतुहल के साथ देखता हूँ। मासूमियत के साथ निहारता हूँ। ऐसे देखता हूँ की जैसे कोई बच्चा आइसक्रीम को देखता है। क्या ये गलत है ?

क्या बच्चे के लिए आइसक्रीम का मोह…प्यार, वासना, अच्छी नज़र, बुरी नज़र या भूख दायरे में रहकर परिभाषित की जा सकती है। तुम मेरे लिए एक तिलिस्मी शिल्प की तरह हो, जीता-जागता, हिलता-डुलता शाहकार। तुम्हें इससे शिकायत है न की तुम्हें इस तरह से क्यूँ देखा जाता है। मुझे भी है यद्यपि हर सजीव प्राणी को होना चाहिए। चर-अचर का अन्तर स्पस्ट है स्वाभाविक है। लेकिन हमारे बीच के संबंधो को सामाजिक भ्रांतिया हमारे पैदा होने से पहले परिभाषित कर चुकी थी। मुझे वही समझ नहीं आता।

मैं तुम्हें तुम्हारे प्राकृतिक स्वरुप में नग्न देखना चाहता हूँ। समझना चाहता हूँ। इसे काम-वासना न समझा जाये। बच्चे की ज़िद भी न समझी जाये। ये निहायत ही साधारण सी बात है जटिल न कि जाए।

विभिन्न कपड़ो में तुम्हारा व्यक्तित्व दूषित लगता है। और लाज़ तो सामाजिक मनोविकृति है। ये गलत नहीं लेकिन सही भी नही। पर ज़रूरत बन गई है क्योंकि लोग कमज़ोर हो गए है। फिर प्रश्न ये उठता है कि तुम्हारी भावनाओं का क्या ? हाँ.. उसकी भी कद्र है। कोई ज़बरदस्ती नहीं और कोई करे तो अपराध की सज़ा दोषनुकूल मिलनी चाहिए। लेकिन किसी के सोच में क्या सही है और क्या गलत ये निर्णय बिना उसे जाने सिर्फ उसकी नज़र से कैसे लिया जा सकता है।

तुम्हें इतना लिखा गया। क्या लगता है बिना देखे लिखा गया ? और क्या लिखने वालों ने सिर्फ एक को देखकर लिखा। क्या वह एक प्रेरणा स्रोत काफी रहा होगा ? क्या शब्दों के उन अप्रतिम मालाओं में दूसरों के बागीचों से चुराये पुष्प न गुंथे गए होंगें ?

मैं मानता हूँ की प्रेम-पत्रों में तुम थी सिर्फ लेकिन काव्य और कथाओं की परिधि मे केवल एक प्रतिरूप अंगीकार न हुआ। यह मानस मंच विविधताओं से पटा हुआ है। खचाखच भरा हुआ। जब तुम्हें इसमें जगह नहीं मिलती तो खीझती क्यूँ हो ? तुमने भी तो कई प्रेमपत्र ठुकराये हैं।

तुम्हारा देह तुम्हारा। पर मेरी कल्पनाओं पर तुम्हें अधिकार चाहिए। ऐसा क्यूं ? तुम सजने-संवरने के लिए स्वतंत्र हो मैं सोचने के लिए। मेरे ख़्यालों में हमारी अंतरंगता के अनेकों नाट्य रूपांतरण मूर्तमान होते है। इनको रचता भी मैं हूँ और धुंए की तरह हवा में घोलकर गायब भी मैं ही करता हूँ। तुम वहाँ खुश नज़र आती हो। रंग हलके दिखते है। रोशनी तेज़ पर आँखों को न चुभती हुई ।

मैं तुम्हें परेशान न करूँगा लेकिन मेरी नज़र तुम्हारी गले से रिसते पशीने की बूंद पर जाएगी। जब तुम हाथ उठा कर अपने बाल बाँधोगी तो तुम्हारे वस्त्रों के मध्य प्रस्फुटित होती कमर का वो टुकड़ा मुझसे छिपा न रहेगा और मैं उस के ज़रा ऊपर और ज़रा नीचे तक अपनी कल्पनाओं में जाऊंगा। तुम्हारी चोटी जब झटक कर चलते समय कुल्हों पर लोटेगी तो भी मैं खुद को एक नज़र देखने से रोक न सकूंगा।

तुम्हारे अंग-प्रत्यंग के उतार-चढ़ाव-ठहराव मेरी सोच में तब तक रुके रहेंगे जब तक मैं चाहूंगा। मैं अपनी कल्पनाओं का मालिक हूँ। तुम्हारे ज़िस्म की थिरकन को मैं महसूस कर सकता हूँ जब तुम्हें सीढ़ी उतरते-चढ़ते देखता हूँ।

अगर मेरा अनुराग किसी नायिका या मॉडल के प्रति हो तो जायज़ लेकिन अगर मैं अपना विषय खुद चुनू तो गलत। ये तो नाइंसाफी हुई। मैं तुम्हें हासिल नहीं करना चाहता हूँ। जीना चाहता हूँ। मेरे प्रेम में एकनिष्ठता है और वासना में वही दोगलापन जो न रहे तो तुम सब एक जैसे हो जाओ। सब एक ही सांचे में बनी मूर्तियों की तरह। निर्जीव… निष्प्राण…वस्तु।

पात्र और चरित्र में अंतर होता है। पात्र की त्रुटियों तो चरित्र पर न डाला जाए। चरित्र मापदंड है तो पात्र केवल अमर्यादित इकाईयां। मैं चरित्र रहा हूँ। पुरुष का चरित्र।

मैं न व्यभिचारी होना चाहता हूँ न संन्यासी। ये पात्र है जो सामाजिक मान्यताओं के किताबों के पन्नों पर अपना नाम ज़रा गहरा अंकित करने प्रयास में मुझे आत्मसात कर, अपनी तृष्णाओं की मिलावट के साथ अलग-अलग स्वरुप में प्रस्तूत करते रहते है। मैं न तो कलंक हूँ न मर्यादा पुरुषोत्तम बनना चाहता हूँ। मुझे प्रकृति ने जैसा बनाया है वैसा ही रहने मुझे। तुम्हारी परिभाषाओं में घुटन होती है मुझे।

देखो बात तुमसे चली और मुझ तक आकर रुक गयी। यही स्वाभाविक है। इसको मत झुठलाया करो। मुझे बदलोगे तो तुम्हारी पहचान भी बदलेगी। हम सिर्फ शब्दों और संभावनाओ से नहीं अपितु सत्य से जुड़े हुए है। तुम्हारा और मेरा सत्य अलग अलग कैसे हो सकता है ! क्या तुम्हारे असहज होने पर मैंने नज़रे नहीं हटायी थी ? क्या कभी तुम्हारा रास्ता बिना तुम्हारे मूक हामी के रोकने की कोशिश की ? क्या मेरी बे-अदबियाँ बाद में मुस्कुराहट बन के तुम्हारे होंठो पर न उभरी थी ? क्या तुम्हारे न कहने पर भी मैं ज़िद करता रहा ?

और अगर ऐसा न हुआ तो यह उस पात्र की गलती है जो पुरुष का चरित्र न समझ सका।

Leave a Comment