इयर बड्स…

गांधीनगर से अहमदाबाद के लिए बहुत कम रेलगाड़िया चलती है। वैसे मुझे तो मुंबई जाना था लेकिन गाँधीनगर से अहमदाबाद तक टैक्सी का किराया, अहमदाबाद से मुम्बई तक के रेल के किराये से भी ज्यादा उठ जाया करता था। इसलिए मैंने ये तरक़ीब खोज ली थी। गांधीनगर से शाम 6:15 की ट्रेन जो इंदौर तक जाती थी वो 1 घंटे में अहमदाबाद पहुंचा देती थी। फिर वहां से 8:45 की लोकशक्ति एक्सप्रेस। अभी पिछली बार आया था तो पता चला ट्रेन के डब्बे नए बन कर आये है।

इस बार सफर में घटनाये कुछ अजीब ढंग से संयोजित होने लगी कि इसे लिखने की ज़रूरत महसूस हुई। तीन दिन पहले अचानक ईमेल आया कि जिस प्रैक्टिकल एग्जाम का इंतजार मुझे महीने भर से था और जिसके लिए मैंने 4-5 ईमेल विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक को विगत 1 महीने में किये थे। वो कल बोरीवली, मुम्बई में तय की गई है। पिछले तीन दिन फिसलते से चले गए। मैं खुद भी एक विश्वविद्यालय में सहायक प्रध्यापक के पद पर कार्यरत हूँ और डिस्टेंस लर्निंग माध्यम से एम.एस.सी. कर रहा था। ये मेरी अंतिम परीक्षा का आखिरी पत्र था। 

आनन-फानन में कल तत्काल से टिकट बुकिंग की। अहमदाबाद से मुंबई की कन्फर्म टिकट मिल भी गयी। लेकिन गांधीनगर से अहमदाबाद की टिकट उस समय उपलब्द्ध नहीं थी। जबकि उसी ट्रेन में थोड़ी ज्यादा लंबी दूरी तक कि टिकट मिल रही थी। मुझे ज्यादा समझ नहीं आया तो मैंने वडोदरा तक की टिकट ऑनलाइन बुक कर ली। पैसे थोड़े ज्यादा लगे लेकिन दिमाग की शांति के एवज में ये कुछ भी नहीं थे। 

अब यहाँ से चीज़े अजीब होती गयी। गाँधीनगर से ट्रेन खुली तो बिल्कुल सही वक्त पर लेकिन ठीक अहमदाबाद पहुँचने के पहले आउटर सिग्नल पर ये ठिठक कर खड़ी हो गयी। अमूमन 7:15 तक ये अहमदाबाद पहुंचा देती थी जिससे दूसरी ट्रेन पकड़ने तक काफी वक्त बच जाता था। मैं इस बीच घर से लाया टिफिन खा लिया करता था। उसके बाद मुम्बई वाली ट्रेन में सो जाना और सुबह बांद्रा में उठना। ट्रेन वहीं तक जाती है। मेरा मुम्बई आना-जाना अक्सर लगा रहता था। गांधीनगर आने से पहले मैं मुम्बई में कई साल रह कर आया था। 

आज पता नहीं क्यों ये आउटर सिग्नल पर आधे घंटे से रुकी थी। बगल की पटरी से 3 ट्रेनें गुजर चुकी थी पर अब भी इसमें कोई हलचल नही। मैं दो-तीन बार दरवाज़े से बाहर झांक आया इस बीच की कुछ पता चले। “सिग्नल लाल है” वहां खिड़की के पास बैठे एक नवयुवक ने मुँह में रखे गुठके को खिड़की से बाहर थूकते हुए कहा। इस जनरल डिब्बे में हम दोनों के अलावा 2 चार और लोग थे जो दूसरी दरवाजे के करीब बैठे थे। मैं चुपचाप वापस आकर अपनी जगह पर बैठ गया। 

गूगल मैप्स पर लोकेशन देखी तो पता चला स्टेशन बस ढाई किलोमीटर दूर है। पैदल दूरी 35 मिनट और कार से 9 मिनट। बाहर रोशनी न के बराबर और दोनों बगल पेड़-पौधे, जंगली झाड़ियाँ और कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था। एक बार ख़याल आया की उतर कर आस पास की सड़क खोजी जाए। मुम्बई वाली ट्रेन तो छोड़ नही सकते। क्या पता ये समय रहते स्टेशन न पहुंचाए। अजीब, बेबाक़ ख़्याल। मन पतंग की तरह उड़ता रहा मैं ढील देते-समेटते इसको काबू में करने में लगा रहा। करीब 45 मिनट के बाद डिब्बे में हलचल हुई और ट्रेन चल पड़ी। मेरी आंतरिक उद्वेलना ट्रेन की गति के साथ शिथिल पड़ने लगी। मैंने बैग से ब्लुटूथ इयर बड्स निकाले और पहन लिए। यूट्यूब म्यूजिक पर गाने चलाकर यात्रा का आनंद लेने लगा। लगभग हर चीज़ यहां से तय सी लग रही थी। अभी अहमदाबाद आएगा फिर वहां अगली गाड़ी के प्लेटफार्म का पता लगाकर उसमे जा बैठना है और क्या! लेकिन…

8 बजे मैं अहमदाबाद स्टेशन प्लेटफॉर्म न. 6 पर उतरा और इधर-उधर लोकशक्ति एक्सप्रेस से सम्बंधित जानकारी ढूँढने लगा। समय काफी था लेकिन मैं चाहता था कि जल्द-से-जल्द अपनी सीट वाले डब्बे के पास पहुंच जाऊं। इयर बड्स लगाए होने की वजह से स्टेशन का कोलाहल मुझ तक बहुत फ़ीका होकर पहुंच रहा था। फ़ीका… जी हां रेलवे स्टेशन के कोलाहल का भी स्वाद होता है। आप कुछ दिन मुम्बई लोकल ट्रेन में सफर कीजिये आपको रेलवे स्टेशनों के खास ध्वनि जायकों का पता चल जाएगा। ख़ैर मैं अपनी धुन में मगन बैग को पीछे दोनों कंधे से लटकाये प्लेटफार्म न. 3 की सीढ़ियों से उतर रहा था। न. 6 से न. 3 तक चल कर आते-आते मैं लगातार इस बारे में सोच रहा था कि बैग में क्या-क्या रखा है जो इतना भारी हो गया है। कुछ कपड़े ही तो है और एक लैपटॉप बैग और कुछ किताबें। इतना वज़न तो नहीं होना चाहिए। शायद अब वज़न उठाने की आदत छूट गयी हो या सच में भारी हो! कपड़ों में इतना वज़न होता है क्या? 

मैं प्लेटफॉर्म पर आ गया था और इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड्स की मदद से अपने नियत कोच की तरफ बढ़ रहा था। सीढ़ी ने मुझे ठीक एस 1 कोच वाले पोल के पास छोड़ा था। मुझे एस 8 तक जाना था। अभी काफी समय था ट्रेन भी नहीं आयी थी तो मैं पास खड़ी रेडी पर चला गया। अभी ठंड जाने-जाने को थी गए हफ़्ते से दिन गर्म होने लगे थे। शाम में उमस होती थी। अमूल छाछ की डिब्बे की तरफ इशारा करके पूछा तो दुकानदार ने 2 उँगलियों से वी बना कर दिखाया और कुछ कहा। उसने मेरी कान में लगे ईयर बड्स देख लिए थे। मैंने दस के दो नोट पर्स से निकाल कर उसको पकड़ाए और छाछ मांगी तो उसने बाहर रखे डिब्बे की तरफ उंगली दिखाई। अब मैंने बाएं कान का बड गर्दन झुकाते हुए उतारा और बोला “ठंडा नहीं है क्या भैया”। दुकानदार ने ना में गर्दन हिला दिया। मैंने ईअर बड वापस लगाया और हाथ बढ़ाकर वापस पैसे मांग लिए। 

सिर्फ 10 सेकंड के लिए मैंने ईयर बड निकाला था उतने में लगा कि आसपास की दुनिया अचानक से बदल गयी है। अभी तक मेरे अंदर की दुनिया मेरे कानों में बजते संगीत की धुन पर समंजयस्य बैठाये हुए थी पर एक कान खुलते ही लगा जैसे कोई माया जाल टूट गया हो। लोगो का चिल्लाना, लाउडस्पीकर से आती आवाज़, बच्चों का चीखना,भगदड़… सब गतिमान। मानो दुनिया नींद से जागी हो। मुझे ठीक से याद भी नहीं कि मैं कौन सा गाना सुन रहा था। मेरा कानों में गिरता संगीत इरेज़र का काम कर रहा था पेंसिल का नहीं। इसलिए शायद मुझे ज्यादा मतलब भी नहीं था कि इसके बोल क्या है धुन क्या है। हाँ बस ये आसपास के कोलाहल को मुझ तक पहुंचने नहीं दे रहा था मैं इसी को सौभाग्य समझ रहा था। इस भीड़ में मुझे अपनी एक जगह मिली थी जहाँ संगीत और शोर पर मेरा नियत्रंण था। तुक्ष्यता की पराकाष्ठा। 

जारी है…

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