अकेले बहुत दिन हो गए डर लगता है
तन्हाई बिछड़ा हुआ हमसफर लगता है।
मुझे तेरी कमी इतनी भी नहीं खलती
बस भीतर से यह शक़्स बेघर लगता है।
आते जाते लोग हाल पूछ जाते है
शायद उनको यह बेखबर लगता है।
अभी इतनी भी दूर नहीं निकला की
अंजान पुराना वो राहबर लगता है।
एक पहर भी न बिता राहें कच्ची हुई
बहुत पास एक पक्का शहर लगता है।
ख़फ़ा हो, बुरा माना है, चलो रहने दो
तुम्हारी मोहब्बत का ये दोपहर लगता है।