वतन में फूल तो खिलने जरूरी है।

तू हिन्दू बन हम मुसलमान बन जाते है।
बहाने इश्क़ के थोड़े इन्शान बन जाते है।।
करते है कबूल कुदरत की दौलत ।
धर्म और मजहब से अनजान बन जाते है।।

या राख हो या मिट्टी में मिल जाते है।
जब तक सांस है कैसे शमशान बन जाते है।।
खुदा खैर दे खामोश जिंदा बेज़ुबानों को।
कैसे उबलती नसों पे कब्रिस्तान बन जाते है।।

अश्कों का क्या है बस बहाने ढूंढते है।
तू बन खबर कभी हम फरमान बन जाते है।।
तकरार ये इश्क़ सा है कब तक लड़ोगे भला।
आ बाहें बढ़ा फिर गुलिस्तान बन जाते है।।

तू चाँद सा इतराये, हम सूरज से जल जाते हैं।
मैखाने में मिलते है कभी गुमनाम बन जाते हैं।।
बहुत खेली है अबतक हमने खून की होली।
तू बन आस किसी की हम अरमान बन जाते है।।

वतन में फूल तो खिलने जरूरी है।
तू धरा बन कभी हम आसमान बन जाते है।।
एक लकीर ही तो है चल मिटा देते है।
गए अंग्रेज़ कबके अब हूंदोस्तान बन जाते है।।

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