तन्हाई ! 

अब पता होता है कि ये रात लंबी तो हो सकती है लेकिन हमेशा के लिए नहीं है। अब वैसी बेचैनी नहीं होती है। उतनी घुटन नहीं होती। आदत हो गयी है नहीं कह सकता लेकिन प्रतिकार का कोई फायदा नहीं तो इस आराम को मेरी मूक सहमति समझा जाये। बेवफाई का जायका ज़रा फीका हो चला है। वो बेचैनी, वो कश-म-कश, वो जो उन दिवास्वप्न से रिश्तों के बनने-बिखरने पर होते थे अब दबे पाँव थोड़ी देर आँख-मिचौली खेलने के बाद चले जाते है।

अब दिल का टूटना मौसमी बुखार की तरह हो गया है। बिना दवा के केवल परहेज़ से ठीक हो जाता है। और हर बार की तरह ये मुझे मेरी चिरसंगिनी के हवाले छोड़ जाता है। तन्हाई !

जब आप सफेद चूने से पुती दीवार पर दो-टूक नज़रे टिकाए रहते है। पुतलियों के हिलने के साथ, छोटे-बड़े कीड़ो सी पंक्तिबद्ध, पारभासी, आकृतियों को अपनी नज़र का पीछा करते देखते है। अविस्वास के साथ देखते है। देखकर मुस्कुराते है। फिर उन काल्पनिक कीड़ो से पहचान सी बन जाती है। तभी आँखे दुखने लगती है। और फिर आप आँखे मीच कर पुनः खोलने के बाद उन्हीं आकृतियों को वापस खोजने में लग जाते है। लगता है जैसे वक़्त का किया मज़ाक वक़्त को लौटा रहे हो। वक़्त ने आपकी काटी अब आप उसको काट रहे है।

फ़िल्मो में कई बार देखा है। हृदय की उद्वेलना को बत्ती जलाता-बुझाता हुआ पात्र चरितार्थ करता दर्शाया जाता है। उसकी हाथो में बिजली का स्विच होता है। लाईट जलने पर उसकी बड़ी सी परछाई दीवाल पर दानवाकार आकृति उकेरती है। लाईट बुझने पर अंधकार सबकुछ एकाकार कर देता है। उस अंधकार में पात्र के साथ दर्शक भी घुलता है। हर बार जब बत्ती बुझती है दर्शक के अंदर का कोलाहल उभरने लगता है। कभी संगीत, कभी शोर, कभी कुछ नहीं…

ये “कुछ नहीं” बेहद डरावना होता है। आपके अस्तित्व से प्रश्न पूछ बैठता है। कुछ तो होना ही चाहिए। अगर आप है तो कुछ तो होगा। गुस्सा होगा, खीज़ होगी, अहंकार होगा, प्यार होगा, शत्रुता होगी, सम्मान होगा, बलिदान होगा… कुछ तो होगा। कुछ तो बचा होगा उस नाकाम कोशिश के बाद, कुछ तो बच गया होगा। और अगर बहुत ढूँढने के बाद भी कुछ नहीं मिलेगा तो, एक आखिरी बार फिर खामोशी से चुप-चाप थोड़ी देर कुछ मत देखना, कुछ मत ढूँढना… फिर मैं मिलूंगा। तन्हाई !

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