मैं यहां स्टैंड उप कॉमेडी करने नही आया हूँ। कबूतरों को गाली देने आया हूँ। आपको बुरा लग रहा होगा। लेकिन मेरे दिल का दर्द नही पता आपको। ये साले झुंड बना के मेरी अकेले में लेते है। मैं इधर इन सब की पब्लिक में लूँगा। और सच्चाई यह है कि मेरे पास बदल लेने का और कोई ज़रिया भी नहीं है।
कई बार आपने सुना होगा लोगो को बोलते हुए। अब तू बस खाने के लिए पैदा हुआ है क्या ? होते होंगे ऐसे लोग। मैं गंरंटी के साथ तो नहीं बोल सकता लेकिन एक बात परम सत्य है। कबूतर सिर्फ हगने के लिए पैदा हुए है। मतलब कितनी बार। एक दिन में कितनी बार। इनका लगता है जैसे जहां बैठो थोड़ी सी पॉटी कर दो बस। काम हो गया। भाई मैं वेला नहीं लेकिन मैंने उड़ते हुए कबूतर की भी हगते हुए देखा है। कभी कभी तो इनके घुहाद्वार से निकले अमृत को कांच की स्लाइडर वाली खिड़की पर ऐसे एंगल पर चिपके देखा है कि मैं दिन भर इस पहेली में उलझा रहा कि कैसे संभव है। मतलब किस तरीके से इस मलत्याग को अंजाम दिया गया होगा। लेकिन इनके जीवन का तो लछ्य मालूम होता कि जहां न पहुंचे रवि और कवि की तो औकात भी नहीं उधर पहुंचने की … वहां भी अपने परिष्कृत मल का त्याग कर के आना है।
मुझे भ्रम है कि इनके बीच दुर्गमनिय स्थानों पर अपना निशान छोड़ने की बाज़ी लगती होगी । शायद उनके लिए ये गर्व का विषय हो। हालांकि जो भी हो इनकीं पोट्टी साफ करते करते कुँवारा बाप बनने जैसा महसूस होता है और वो भी बिना बच्चे के। इनकीं ज़िन्दगी में हगने का इतना महत्व है कि ये इंशानो की तरह बी.एच.के के कांसेप्ट से ऊपर है। इनको बस संडास चाहिए होता है। बस ये उधर ही हगेंगे और उधर ही गृहस्ती बसा लेंगे। मिया बीवी दोनों खुद के ही मल-मूत्र में अपना घरौंदा बना लेंगे और परिवार शुरू। जी शुरू बस एक बार शुरू हुआ तो उसका कोई अंत नही। हर 2 महीने में आपको घर का नया सदस्य मिल जाएगा जो कि अगले 2 महीने में अपना घर बसाने के काबिल हो वहां से पलायन कर चुका होगा और उसकी जगह अंडे से निकला कोई नवयुवक या नवयुवती ले चुकी होगी। इनका सीधा हिसाब है। एक बच्चा कबूतरी के गर्भ में, दूसरा अंडे में और तीसरा प्रणय आतुर जोड़ी की तलाश में। यही चक्र तबतक चलता है जब तक कोई मानव उनके टट्टी के स्वर्ग में बाधा न डाले।
ये मासूम दिखते है। क्या पता होते भी हो। लेकिन ज़रा पास जाओ इनको भागने तो ये ऐसे उड़ कर भागते है जैसे इनको पता हो कि इनकीं कुछ गलती हो। इनके चेहरे पर गर्व नहीं दिखता। चतुराई भी नहीं दिखती। मासूमियत दिखती है हाँ जिसे हम बेवकूफी समझ लेते है और इसी का ये फायदा उठाते है। मैंने बहुत से पक्षियों पर गौर किया है जब उनको भगाओ तो वो चोर की तरह नहीं भागते। ये भागते है।
सामने पेड़ो की कतारें हो । वहां दुनिया भर के जीव जंतु घर बनाये है मेहनतकश प्राणी। लेकिन इन कबूतर को बिल्डिंग की बालकनी पसंद है। और घोंसला बनाने के नाम पर ये मज़ाक करते है। इनके गृह निर्माण कौशल की तुलना हमारे राष्ट्र की राजनेताओं की नैतिक चेष्टाओं से अविवादित रूप से किया जा सकता है। ये कही से भी बालकनी की टाइल पर दो चार पतली टहनियां डाल देंगे और उसी को घोसला मां लेंगे। लगता है जैसे सीट रिज़र्व करने के लिए किसी ने ट्रेन की खिड़की से रुमाल फेंक दिया हो।
मुझे सहजीविता से कोई वैर नहीं। मैं ये भी नही कहता कि मेरे काम आओ। मैं बस ये कहता हूँ कि मुझे काम में मत लाओ। मेरे पास पहले से ही बहुत है। सुबह सुबह खिड़की के बाहर नीम से पेड़ो का वास करने वाले सुमधुर पक्षियों के कलरव सुनकर उठने के बाद जब बालकनी में तुम्हारे झड़े हुए पंख और चिरकाल से वंद न हुई दस्त का प्रसाद दिखाई देता है और जीवन और भी दुस्कर जान पड़ता है। तुम बालकनी में रहो बालकनी छोड़ो कमरे में रहो … बीवी बच्चो के साथ रहो लेकिन सफाई से रहो। चलो थोड़ी बहुत इधर उधर की बात अलग है। हफ्ते में एक बार तो मैं बिना न-नुकर के सफाई करने को तैयार हूँ। लेकिन हर तीसरे दिन बालकनी का भूगोल बदल जाता है। समतल मैदान पे पठार उभर आते है। और नाक के बाल जलाने वाली खुशबू … उसके तो क्या कहने।
ये हफ्ते दर हफ्ते की टट्टी सफाई आपके भीतर एक आंतरिक विद्रोह को जन्म देती है जो समय के साथ हताशा का स्वरूप ले लेती है। इसी हताशा की हृदय विदारक वेदना लेकर आपके सामने खड़ा हूँ। सुनिए और हँसिये… खूब ज़ोर ज़ोर से हँसिये। भगवान करे आप कल सुबह उठे और आपकी बालकनी में भी 2 दर्ज़न कबूतरों का झुंड जमा हो। आप प्रकृति को अपने छद्म रूपी आधुनिकता की परिचायक प्रांगण का मखौल उड़ाती बालकनी में अवतरित होता देख प्रफुल्लित हो। आपका हृदय असीम अनुकंपा से भर जाए और आप सप्रेम कबूतरों को दाना डाल दे। बस फिर आपका काम समाप्त। ये जन्तु स्वाभिमान से ओतप्रोत आपको आपका दाना 2-3 घंटो में वापस कर जाएंगे। आपको इनके टट्टी का स्वर्ग मुबारक।