आज सफाई की कमरे की और फिर वही पुराने उहापोह में दिल और दिमाग बेचैन है। फिर से वही चीज़े सामने रखी है जो किसी इस्तेमाल की नहीं या कहे तो शायद बिता वक़्त जो छाप छोड़ कर गया है उन पर, उसकी इज़ाजत नहीं देता। ये पहली बार नहीं है पता नहीं कितनी बार यह नया आदमी उसी पुराने आदमी से हार गया और फिर भी खुश जान पड़ता है। अब मैं गिनती नहीं रखता । बस अगली बार फेंक दूंगा … न घृणा है न तृष्णा है न प्यार है न जाने क्या है जो कौंधता है ज़हन के अंदर और मांगता है जवाब की जो सच तुमने जिया उसे किसी और के झूट के लिए भूलने की कोशिश करना कहाँ की ईमानदारी है।
समय तब नहीं समझ में आता जब कोई इसको नापने वाली चीज़ सामने रखी हो तब आता है जब कोई बांटने वाला न हो। समय बीत गया और एक घड़ी छोड़ गया जो अब नहीं चलता। कुछ नहीं बताता। कुछ नहीं कहता। पर इतना कुछ छुपाये बैठा है की शब्दों की सिमा तोड़कर भी बयान कर पाना मुश्किल है। जिसे मैंने समय दिया वो मुझे घड़ी दे गयी। उपहास किरदार में नहीं कहानी में होता है। और मेरी कहानी को मुझ पर हँसने का पूरा हक़ है।
वो पर्दे जो तुम साथ नहीं ले गए थे । अब झरोखे की बाहर की दुनिया नहीं छुपाते। वो अब खुद खिड़कियां बन गए है दिखाते है वो समय जब इन आँखों में सपने हुआ करते थे। आस पास कुछ अपने हुआ करते थे। समय इतना भी नहीं बिता जितना मैं बीत गया हूँ ।
आज भी जब कभी अलमारी में कपड़े खोजते समय कपड़ो के तहों के बीच तुम्हारा टॉप निकल आता है तो होठो और आँखों के बीच नोकझोंक शुरू हो जाती है की पहले मुस्कुराये की आंसू रोके। बड़े अमीर होते है वो लोग जिन्हें मुस्कुराते होंठो पे खुद के अश्को का स्वाद मिलता है। ऐसी दौलत होती है इनके पास जो कोई नहीं छीन सकता। और ऐसी की खर्च किये न होती है बस बढ़ती ही जाती है। मैं बहुत अमीर हूँ बहुत ज्यादा बस मेरी दौलत दुसरे तरह की है जो यहां नहीं चलती।
मेरे शब्दचित्रों पे अगर कोई परिचित आकृति उभर आये तो छमा अनुग्रहि रहूँगा। वैसे ये मेरी कल्पना का टुकड़ा नहीं दर्पण में दृश्य अर्धसत्य है।