वही शाम…

मेरे लब्ज़ों से तुम क्या ले जाओगे।
थोड़ी उदासी की तपिश,
थोड़ी काँटो की छुअन,
थोड़ी सी दिलफ़रेब सुबह,
थोड़ी सी मक्कार रात,
और एक अनसुलझी तनहा शाम।
वही शाम जिसके इंतज़ार में तुम,
बेसब्र हुआ करते थे, कभी।
वही शाम जो दिन को किसी,
अजगर की तरह सनै-सनै निगल लेती थी।
वही शाम जो उस जगह खींच ले जाती,
जहाँ तुम उस से पहली बार मिले थे।
वही शाम जो कभी सड़क की भीड़ को जलसा,
और शहरी शोर को संगीत बना देती थी।
बर्फ के खट्टे-मीठे गोलों पे सिहरती,
जून के महीने की उबलती,
वही शाम।

नवंबर की खुश्की से फटे होंठो पे,
गीली नर्म चादर सी बिछती,
वही शाम।

बसंत की बयार सी महकती,
कंक्रीट की गलियों में टहलती,
वही शाम।

काज़ल के कोरों पे खींची,
धीमी हवा में बिखरती गेशुओ में ढकी,
वही शाम।

कभी हाथ पकड़ती,
कभी पीछे से चप्पल पे चढ़ती,
वही शाम।

कभी मुझ पे गरजती,
कभी घरवालों से छूप के बात करती,
वही शाम।

वही शाम जिसमें पूरा मैं था,
आधी तुम थी,
और बाकी न जाने क्या था।
न जाने क्या था,

जो तब समझना नहीं चाहता था।
और अब समझ नहीं पता।
फिर तुम्हारे हवाले,
एक अनसुलझी तनहा शाम।।

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