कुछ उधरे ख़्याल बुन रहा हूँ।
बड़ी भीड़ है यहां,
अब ख़ामोशी चुन रहा हूँ।
मेरे जज़्बात अक्सर टोक देते है।
हूँ अकेले बैठा क्यूँ,
और किसको सुन रहा हूँ।
माहौल।
आजकल जब शाम तेरा पता पूछती है तो कह देता हूँ बाजार गयी है अभी आ जायेगी। जब तक वो आती है तब तक मेरे साथ ही बैठ जाओ।
पहले तो बड़ा ख़ुशनुमा होता था जब तुम और हम अकेले हुआ करते थे। कभी आवारा सड़को पे बेमतलब तुम टहलती थी मेरे साथ। तो कभी तंग गलियों में सनी तुम्हारी स्याह होती पड़छायी जो बहला कर मुझे चुप चाप वापस घर की तरफ भेज देती थी। फिर ऐसा भी दौर आया था जब हम-तुम एक-दुसरे में गुमनाम हो जाते थे। ज़रा तुम और ज़रा हम बदनाम हो जाते थे। मेन रोड वाले चौराहे पे नींबू वाली लाल चाय के स्वाद की तरह तुम होठों पे चिपकी रहती थी।
खयाल।
वो आईने में कभी-कभी जवान झुर्रियों और एक-आध सफ़ेद बालों के झरोखे से झांकता जो कोई हमशक्ल सा, पहचाना सा, अनजाना सा, गैर सा दिखता है जिससे तुम मुँह चुरा लेते हो! जानते ही कौन है वो ?जो बीते समय की दरख़्तों पे मुरझाते पतझड़ की कसक की एक चूंटी सी काट जाता है। जानते हो कौन है वो ?
तब पूछता हूँ की उस भूले धुँधले, बेख़ौफ़, बेपरवाह मंज़र की गुज़रती सी महक की तरह, क्या कभी साँसों में बेचैनी सा मैं घुलता हुआ मिलता हूँ क्या ?
सवाल।
सच बता क्या ख़्वाबों में कभी मैं अब भी चला आता हूँ ? सुबह अलसायी उनींद से लदी पलकों में खिड़की के पर्दे से छानकर आती रोशनी में कोई पहचाना सा अक्स दिखता है क्या ? उस बस स्टॉप के चौराहे पे जहां से तुमने कभी बस नहीं पकड़ी थी खड़ी रहती हो क्या तुम ? क्या कभी अकेले तन्हा बैठे गर्दन के पीछे मेरी उँगलियों की सरसराहट महसूस होती है ?
सोंचता हूँ कभी-कभी की ये जो बिता था हमारे बीच, क्या बस वक़्त था। या तुम-हम भी थोड़े खर्च हो गए थे उन लम्हों में खुरच-खुरच कर। क्या शाम वैसी ही बेचैनी लिए आती है अब भी तुम्हारे शहर में। और क्या अब भी पल्सर के हॉर्न की धीमी सी आवाज़ उतनी ही साफ सुन लेती हो चौथी मंजिल से ? याद नहीं कितनी बार ये शर्ट धो चुका हूँ लेकिन मेहंदी में मिले प्याज़ की महक जाती ही नहीं है इससे। प्याज़ के आँसू, लबों पे मुस्कुराहट। वो तौलिया मेरी शर्ट से ज्यादा मैला तो न था। उसे ही तर कर देती। वो सूती कमीज़ सारा पानी सोख तो गया था लेकिन सीने पे ऐसा खुशनुमा दाग़ छोड़ गया कि अब भी बेकशी में आईना ताने मारता है। पूछता है दाग देखकर भी भला कोई, क्या यूँ खुश होता है?
तब पूछता हूँ की सच बता की क्या ख्वाबों में कभी मैं अब भी चल आता हूँ…