दुकानें सज रही है लोग बिक रहे है। घर खाली है दुनिया आजकल बाज़ार में रहा करती है। कुछ बेच देने की, कुछ हासिल करने की, ज़रूरत है ऐसा तो लगता नहीं। फिर इन आँखों में भूख कहां से आती है। लगता है सब यादें बुनने का कारोबार है। सही भी है… आखिर यही तो बचता है…हालाँकि जो भी हो… समय की कीमत पर यादें सहेजने का धंधा कभी नफ़ा नहीं दे सकता। लेकिन हर चीज़ में नफ़ा-नुकसान कहाँ देखा जाता है। कुछ काम तो ज़िंदा महसूस करने के लिए करना ही पड़ता है।
पुराने जूतों की दुकान सजाता हुआ आदमी – ख़ैरात में नहीं लाया है भाई। दाम वाज़िब लगे तो लो नहीं बोनी का टाइम है।
पात्र – हसरत भरी नज़र से एक बार जूतों की तरफ देखकर। फिर रुख़ ज़रा करा करके। दाम वाज़िब ही बोला है। सौ-पचास और लगा के तो नया आ जायेगा।
दुकानदार – तो मालिक, नया ही ले लियो। इससे कम तो नहीं होगा।
पात्र – आगे देखकर आता हूँ।
क्या देखने जाता है ये ख़रीददार ? अपनी औकात। या तस्सली ढ़ूढ़ने जाता है ? या इसको समय चाहिए ? इसे मालूम है कि सौदा बुरा नहीं। उम्मीद भी नहीं कि वो दाम गिरा देगा। पर फिर भी दुनिया है दस्तूर है निभाना तो पड़ेगा। कहा तो था कि कुछ काम बस ज़िंदा महसूस करने के लिए करना होता है। “आगे देखकर आता हूँ।” ये कहकर पात्र ने अपनी बेबसी छिपाने की नाकामयाब कोशिश की। रोज़ के धंधे में सैकड़ो ग्राहक इस तस्सली की “मोल सही मिला है” सोचकर खुश रहते है। खुशी दो-तरफी हो तो इतनी दमदार नहीं होती।