मयस्सर चाँद न होता है अब,
कलिखनुमा रात हो गया है ,
दौलत की ज़ुफ्त्जो में इशरत ,
दुनिया एक बिसात हो गया है ,
दिन ईमान की बातो में क्या रखा है ,
खुसामद’इ साहब ही नमाज हो गया है ,
दहसत से लबरेज बस्तियां फैली है हर ओर…
कफ़न अब रंग बिरंगा लिबास हो गया है ,
मोमिन हैरान है बदनसिबी पे अपने ,
इंसान, इंसान का गुलाम हो गया है ,
के नब्ज़ बंद है तिजोरियों में काफिरों की ,
चंद टुकरे कागज़ के हुक्मरान हो गया है!